साक्ष्य पर वक्तव्य
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अतएव, स्वर्णमान तथा विनिमय मान के बीच कभी भी कोई विकल्प नहीं हो सकता। यदि हम स्वर्णमान को नहीं चाहते तो हमें प्रो. फिशर का क्षतिपूरक मान या प्रो. जेकेन्स का तालिकाबद्ध मान अपना लेना चाहिए। चुनाव वास्तव में उन दोनों में से एक तथा स्वर्णमान में से करना है। इसमें संदेह नहीं, कि क्षतिपूरक मान का तालिकाबद्ध मान, स्वर्णमान की अपेक्षा बेहतर होगा। परंतु उनको व्यवहार्य बनाए जाने से पहले मानव जाति को अपेक्षाकृत और दार्शनिक न होना पड़ेगा और जब तक ऐसा नहीं होता मेरे विचार से तब तक स्वर्णमान को ही केवल एकमात्र मुद्रा प्रणाली के रूप में स्वीकार कर लिया जाना चाहिए जो कि ‘‘धोखेबाजी से रहित’’ तथा सुस्पष्ट है।
अगला महत्वपूर्ण प्रश्न स्वर्ण निधि के संबंध में है। निधि के स्थान, संरचना आदि जैसे मामलों पर विचार-विमर्श करने से पहले इस बात का निश्चय करना आवश्यक है कि हम उसे चाहते हैं या नहीं। वह प्रश्न अपने क्रम से एक और दूसरे प्रश्न पर निर्भर करता है जो उस तरीके से संबंधित है, जिसमें स्वर्णमान का प्रारंभ कराना है। इस संबंध में मैं यह कहना चाहता हूं कि यहां अनेक लोग ऐसे हैं जो यह समझते हैं कि स्वर्णमान की शुरूआत का अर्थ केवल मात्र एक टकसाल का शुरू करना और सोने के सिक्के जारी करना है, इससे अधिक भ्रांतिपूरक और कुछ नहीं हो सकता। स्वर्णमान का अर्थ सोने की टकसाल को आरंभ करना नहीं है बल्कि ऐसी व्यवस्था करना है जिससे सोना व्यवहार में आने लगेगा। क्योंकि मुद्रा मानक होती है। अब सोने को प्रचलन में लाने के लिए, यह आवश्यक है कि और दूसरी प्रकार की मुद्रा की मात्रा सीमित होनी चाहिए। मुद्रा को दो तरीकों से सीमित किया जा सकता है। एक तरीका उसे परिवर्तनीय बनाना है और दूसरा उसके निर्गम की सकारात्मक सीमा को निर्धारित करना है। यदि आप परिवर्तनीयता को, सीमा लगाने के एक तरीके के रूप में अपनाना चाहते हैं तो फिर स्वर्णनिधि को बनाए रखने का औचित्य है। यदि आप निर्गम की स्थिरता को सीमा लगाने के लिए तरीके के रूप में अपनाना चाहते हैं तो स्वर्णनिधि को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। इन दो प्रणालियों में से मैं निर्गम प्रणाली की स्थिरता को वरीयता देता हूं। इसके लिए मेरे विचार में दो कारण हैंः-
(1) विनिमय मान का दोष यह है कि यह प्रबंधन पर निर्भर होता है। अब,
परिवर्तनीय प्रणाली भी प्रबंधित प्रणाली होती है। इसलिए परिवर्तनीय प्रणाली
को अपनाकर हम प्रबंध के उस दोष से छुटकारा नहीं पा जाते तो वास्तव
में वर्तमान प्रणाली के विनाश का कारण है। इसके अतिरिक्त एक प्रबंधित
मुद्रा से उस समय पूर्णतया बचना चाहिए, जब प्रबंध सरकार के हाथों में
हो। जब प्रबंध बैंक के हाथ में हो तब कुप्रबंध का अवसर कम होता है।