साक्ष्य पर वक्तव्य - Page 335

320 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

साधारण मान के इस प्रकार विकृत होने की संभावना की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। दुर्भाग्य से भारत में मुद्रा प्रणाली के इतिहास में ऐसी विकृति का प्रचुर प्रमाण है। हमारे यहां पहले से ही मूर्ख प्रशासक हुए हैं जो इस विचार से ग्रस्त रहे थे कि निधि का होना बहुत ही आवश्यक होता है और इसलिए केवल निधि को बढ़ाने के लिहाज से ही किसी अन्य बात पर ध्यान दिए बिना मुद्रा प्रचालन करते गए। देश में ऐसे असंख्य मूर्ख व्यापारियों की भी कमी नहीं जिन्होंने मुद्रा के विषय में कभी किसी और बात की जानकारी किए बिना, विनिमय मान की केवल मात्र इस आधार पर निंदा की कि सरकार उनको निधि का प्रयोग करने की अनुमति नहीं दे रही है, जैसे कि व्यापार में धूम मचाना व उसे बढ़ाना, मुद्रा निधि का समुचित कार्य हो। इसी प्रकार हमारे बीच में ऐसे मूर्ख राजनीतिज्ञ भी हैं, जो उन लोगों के मित्र के रूप में अपने-आपको विज्ञापित करना चाहते हैं जो इस निधि का उपयोग जनता को शिक्षित करने के लिए करना चाहते हैं। इन तीनों में से कोई भी वरदान का रूप धारण कर आसानी से विपत्ति ला सकता है और यह सब मुद्रा के सिद्धांत से अनभिज्ञ होने के कारण है। इसलिए एक ऐसी मुद्रा प्रणाली का आरंभ करना बहुत बेहतर होगा जो विनिमय मान को समाप्त कर देगा, और साथ ही स्वर्णमान निधि को भी, जिसको बनाए रखना किसी भी दिन अनिष्ट का कारण बन सकता है।

  1. अतएव, भारतीय मुद्रा के सुधार के लिए मेरी योजना की निम्नलिखित आवश्यकताएं हैंः-

(1) टकसालों को सरकार के लिए भी उसी प्रकार पूर्णतया बंद कर दिया जाए

जिस प्रकार वे जनता के लिए बंद हैं और रुपये के सिक्कों को बनाना बंद

कर दिया जाए।

(2) सोने के एक उपयुक्त सिक्के को बनाने के लिए सोने की एक टकसाल

खोली जाए।

(3) सोने के सिक्के तथा रुपये के बीच एक अनुपात निश्चित किया जाए। (4) रुपया सोने में परिवर्तनीय न हो, और सोना रुपये में परिवर्तनीय नहीं होना

चाहिए, परंतु दोनों कानून द्वारा निश्चित अनुपात पर अप्रतिबंधित वैध मुद्रा

के रूप में चलन में रहें।

  1. यह निधि की इस विद्यमान राशि की आवश्यकता मुद्रा के लिए नहीं है तो इसका क्या उपयोग होता है? इसके संबंधों में यह चाहूंगा कि इसका उपयोग सरकार द्वारा, साधारण राजस्व की अतिरिक्त राशि के रूप में किसी भी ऐसे सार्वजनिक कार्य के लिए किया जाए जो आवश्यक प्रतीत होता हो। परंतु सुधरी हुई मुद्रा में दुर्बलता के कुछ स्रोत रहेंगे, जिन्हें पहचानना बुद्धिमानी का काम होगा। फाउलर समिति के विपरीत, मेरा यह दृढ़ मत है कि यदि रुपये की मुद्रा की एक बार