साक्ष्य पर वक्तव्य - Page 336

साक्ष्य पर वक्तव्य

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प्रभावी रूप में सीमित कर दिया जाए तो यह अपने मूल्य को बनाए रखेगी और इसके लिए किसी निधि की आवश्यकता नहीं होगी। परंतु यह ऐसा अवसर है कि रुपये की मुद्रा की प्रचलित वर्तमान मात्रा इतनी अधिक है कि जब व्यापार में मंदी होगी तो यह फालतू हो सकती है और इसकी अधिकता के कारण इसके मूल्य में गिरावट हो सकती है। ऐसी आकस्मिकता से बचने के लिए मेरा यह प्रस्ताव है कि सरकार को चाहिए कि वह स्वर्णमान निधि का कुछ हिस्सा रुपये की मुद्रा को बड़ी मात्रा में कम करने के लिए प्रयोग करे ताकि घेराबंदी के समय में भी यह तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित रहे। मुद्रा में दुर्बलता का द्वितीय स्रोत कागज की मुद्रा की निधि की विलक्षण संरचना से उत्पन्न होता है। वह दुर्बलता ‘‘सृजित प्रतिभूति’’ के प्रचलन व विद्यमानता में निहित होती है। मैं यह यह चाहूंगा कि कागज की मुद्रा निधि के इस भाग को यथासंभव शीघ्र से शीघ्र समाप्त कर दिया जाए। क्योंकि, जब तक यह नहीं किया जाता तब तक कागज की मुद्रा को सुरक्षित रूप में उतना मूल्य सापेक्ष नहीं बनाया जा सकता, जितना कि इसे होना चाहिए। अतएव मैं यह सिफारिश करूंगा कि स्वर्णमान निधि की शेष राशि का उपयोग, कागज की मुद्रा निधि में ‘‘सृजित प्रतिभूतियों’’ के रद्द करने में लिया जाए।

  1. परिवर्तन के रूप तथा प्रकृति के स्वरूप के संबंध में अपने विचार प्रकट करने के बाद, अब मैं अपने महत्वपूर्ण प्रश्न अर्थात ‘‘सोने तथा रुपये के बीच अनुपात’’ के संबंध में चर्चा करूंगा। युद्ध के परिणामस्वरूप, स्वर्णमान वाला कोई एक ऐसा भी देश नहीं है जो अपने सोने की युद्ध से पूर्व की सममूल्यता को बरकरार बनाए रख सका हो। उनमें से कुछ ने इसमें इतनी अधिक गलती की है कि अब किसी निश्चित मात्रा में इस तक पहुंचना उनकी क्षमता के बाहर है। परंतु यह कार्य कितना ही असंभव तथा अनुचित हो, युद्ध से पूर्व की सममूल्यता को पुनः प्राप्त करने की उत्कंठा विश्वव्यापी प्रतीत होती है। किन्तु भारत तथा अन्य देशों के बीच अंतर है। दूसरे देशों को युद्ध से पूर्व की सममूल्यता पर अभी पहुंचना है। इसके विपरीत भारत, युद्ध से पूर्व की सममूल्यता से ऊपर पहुंच गया है। इस अंतर के परिणामस्वरूप, भारत तथा अन्य देशों के समक्ष अलग-अलग समस्याएं हैं। यूरोप के देशों में मुद्रा अपस्फीति की एक समस्या है अर्थात मूल्य वृद्धि है, दूसरे शब्दों में कीमतों में गिरावट लाने की है। भारत में मुद्रा स्फीति करने की समस्या है अर्थात् उसके मूल्य घटाने की है, दूसरे शब्दों में कीमतों में वृद्धि करने की है क्योंकि शिलिंग 6 पैंस सोने से 1 शि. 4 पैंस में परिवर्तन का यही अर्थ है और कुछ नहीं। क्या युद्ध से पूर्व की सममूल्यता पर वापिस पहुंचने के लिए मुद्रा को बढ़ाना चाहिए? कुछ लोगों का यह विचार है कि युद्ध से पूर्व की समानता की पुनः स्थापना न्याय प्रदान करेगी और हमें प्राचीन मूल्य