भारतीय मुद्रा और वित्त के संबंध में 15 दिसम्बर, 1925 को शाही आयोग के समक्ष साक्ष्य - Page 353

338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

6093 मेरा तर्क है, मैं कहता हूं, ठीक है परंतु इसे दूसरे दृष्टिकोण से देखिए। फिर भी,वह ही समता है, जो बात मुझे अपील करती है, वह यह है कि आप अपनी रुपये की मुद्रा को कम किए बिना अपनी निधि को कम नहीं कर सकते और मैं यही बात पूरी करना चाहता हूं। यह बिल्कुल सच है। मैं उसे स्वीकार करता हूं। परंतु मेरा यह निवेदन है। एक निधि का, वास्तव में, क्या उपयोग है? मान लिया आपके पास बहुत विशाल निधि है और आपके पास रुपये का विशाल परिसंचरण भी है। क्या इस तथ्य का कि आपके पास अपने भंडार किसी सेफ में, विशाल निधि है, किसी रूप में, रुपये के मूल्य पर प्रभाव पड़ता है? नहीं पड़ता। रुपये के मूल्य केवल उसकी मात्रा तथा परिसंचरण की मात्रा से प्रभावित होगा। इसके मूल्य का निधि से बिल्कुल कोई संबंध नहीं होता है। पृष्ठाधार का पूर्णतया मुद्रा के मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इसमें संदेह नहीं कि इसका प्रभाव उस समय पड़ता है जब वह असंगठित हो। उसके फलस्वरूप उस मुद्रा में विश्वास हो सकता है, परंतु मेरा यह निवेदन है कि जब मुद्रा ऐसी स्थिति में आ जाती है कि लोगों को उसमें कुछ विश्वास करना पड़े, तो मेरा कहना यह है कि वह मुद्रा पूर्णतया स्फीत होती है।

6094 क्या यह निःसंदेह इस प्रस्ताव को स्वीकार करना है कि मुद्रा के मूल्य का निश्चय अंततः व्यापार के संदर्भ में उसकी कुछ मात्रा द्वारा किया जाएगा?- जो मैं कहता हूं वह यह है कि यह संबंध अंततः खतरनाक रूप में परस्पर संबद्ध है, और मुझे यकीन है कि आप रुपये के सिक्के अनिश्चित रूप में लगातार केवल इसलिए नहीं ढाल सकते, क्योंकि यहां स्वर्णनिधि होती है। यदि आप ऐतिहासिक रूप में, इस मामले की तह में जाएं तो मेरा निवेदन यह है कि वास्तव में ऐसी बात रही है। भारत के इतिहास में जिन लोगों को मुद्रा कार्य करना पड़ा है, उन्हें इस विचार द्वारा कि उनके पास कुछ निधि होनी चाहिए इतना अधिक मुग्ध कर दिया गया था कि उसके लिए रुपये के सिक्के बनाना आरंभ कर दिया गया था। भारत में, 1895 तथा 1898 में जब फाउलर समिति की रिपोर्ट को लागू किया गया और सुधार आरंभ किए गए तब एक बात भारत में रुपये के सिक्के बनाना भी। परिसंचरण में रुपये की मात्रा को देखकर सर एडवर्ड लॉ इतना अधिक अभिभूत हुआ कि उसने यह महसूस किया कि इसके लिए कुछ निधि होनी चाहिए। इस आधार पर ही, उसने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि सरकार को रुपये का सिक्का बनाने की अनुमति होनी चाहिए। यदि वह समुचित रूप में इस बात को जानता है कि यदि रुपये की मात्रा सीमित व प्रतिबंधित रहेगी तो रुपयों का मूल्य बना रहेगा, तो फिर वह निश्चय ही मुद्रा में लगातार वृद्धि न करता। मैं केवल वही सिफारिश कर रहा हूं जो भारत सरकार ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट