भारतीय मुद्रा और वित्त के संबंध में 15 दिसम्बर, 1925 को शाही आयोग के समक्ष साक्ष्य - Page 355

340 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है तो वह फालतू हो सकता है। और अत्यधिक होने के कारण, उसके

मूल्य में क्षति हो सकती है। ऐसी संभावना के बचाव के रूप में, मेरा यह

प्रस्ताव है कि सरकार को स्वर्णमान निधि के एक भाग का प्रयोग रुपये

की मुद्रा को प्रचुर मात्रा में कम करने के लिए करना चाहिए ताकि भारी

अवमूल्यन के दौरान भी वह समय की आवश्यकता के अनुकूल सीमित

रह सके।’’ वह कार्य किस प्रकार होगा?-आप केवल रुपयों को वापिस

कर लें और पुनः जारी न करें कुछ सीमा तक रुपया वापस करने प्रक्रिया

से लगा।

6100 ताकि रुपया, उस समय तक, सोने में परिवर्तनीय नहीं होगा? वह सोने में

कभी भी उस समय तक परिवर्तनीय नहीं होगा जब तक वह अपनी सीमा

तक नहीं पहुंचता जिससे वह कभी भी, यहां तक कि मंदी के समय में

भी अधिक नहीं होगा। रुपया खोने से परिवर्तनीय नहीं होगा और स्वर्ण

रुपये में परिवर्तनीय नहीं होगा। जैसे कि अभी है, मुझे इस बात का अधिक

डर नहीं है कि रुपये में बट्टा होगा। बल्कि इसमें बट्टा हो भी सकता है

और इसलिए मैंने उसके बचाव का प्रस्ताव रखा है।

6101 फिर अनुपात के प्रश्न पर आकर, आप कहते हैं, ‘‘यूरोपीय देशों में मुद्रा

अस्फीति की एक समस्या है अर्थात् मुद्रा के मूल्य में वृद्धि करने की

समस्या है, दूसरे शब्दों में, मूल्यों में गिरावट लाने की समस्या है। भारत

में, समस्या मुद्रा की स्फीति करने अर्थात् मूल्यह्रास करने की एक समस्या

है। दूसरे शब्दों में मूल्यों में वृद्धि करने की समस्या है। 1 शि. 6 पैंस

सोने से 1 शि. 4 पैंस में परिवर्तन का यह अर्थ है, और कुछ नहीं। क्या

मुद्रा की स्थिति युद्ध से पूर्व की समानता पर पुनः वापिस पहुंचने के लिए

उसमें स्फीति करनी चाहिए? फिर आप यह बताते हैं कि युद्ध से पूर्व की

समानता की पुनःस्थापना युद्ध से पूर्व के मूल्य स्तर की पुनःस्थापना नहीं

है क्योंकि अब सोने के मूल्य में परिवर्तन है?- हां

6102 इसके अलावा आगे आप यह बताते हैं कि इस संबंध में दो बातें ध्यान

में रखनी चाहिए। वर्तमान ठेकों में वे शामिल हैं जो पूर्ववर्ती अवमूल्यन

तथा मूल्यवृद्धि के प्रत्येक स्तर पर लिए गए और इन सबके साथ ठीक

प्रकार से निपटने के लिए इस बात की आवश्यकता होगी कि प्रत्येक का

निपटारा किया जाए। यह कार्य इसकी जटिलता तथा विशालता के कारण

असंभव है।’’ मैं यह समझता हूं कि जिस मत पर आप बल देते हैं, वह

यह है कि हम रुपये के मूल्य में एक बहुत बड़े उतार-चढ़ाव के दौर से

गुजर रहे हैं और कि प्रत्येक स्तर पर ठेके किए गए हैं तथा किसी ऐसे

निश्चित अनुपात को निर्धारित करना असंभव है जो उन समस्त ठेकों के

बीच न्याय करेगा जो विभिन्न स्तरों पर किए गए हैं? - हां।