भारतीय मुद्रा और वित्त के संबंध में 15 दिसम्बर, 1925 को शाही आयोग के समक्ष साक्ष्य - Page 357

342 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

से कोई सुझाव है? जैसा मैंने बहुत संक्षेप में संकेत दिया है, यदि हम

मौसमी कार्यों के लिए अपनी मुद्रा को लचीला बनाना चाहते हैं तो हमें

किसी प्रकार यह देखना चाहिए कि वाणिज्यिक कागज को जिसने व्यापार

के लेन-देन व सौदों में वृद्धि की है, मुद्रा में परिवर्तित कर दिया जाए ताकि

वाणिज्यिक कागज को सरकारी बोर्डों की अपेक्षा, मुद्रा के निर्गम के लिए

अधिक आधार बनाया जाए। मेरे विचार से प्रस्तावों को जर्मन इम्पीरियल

बैंक में अपनाए तो वह भारत के लिए अच्छा होगा। उन्होंने निःसंदेह, थोड़े

बदलाव के साथ कम या ज्यादा इंगलिश बैंकिंग एक्ट, 1894 को अपनाया

है ताकि वह मौसमी मांग के अनुकूल हो सके।

6109 क्या वह प्रावधान विस्तार के लिए है?µ

इस समय, कुछ विनियमों के अंतर्गत कागज के निर्गमों के विस्तार के

लिए है।

6110 क्या वह प्रावधान न्यासीय निर्गम के विस्तार के लिए है?-बिल्कुल

ठीक।

6111 क्या यह अनुपाती कर के भुगतान के लिए बदले में हैµहां, मेरे विचार से

यह दोनों के लिए पर्याप्त सुरक्षा है।

6112 (प्रोफेसर कोयाजी), आपके मत के अनुसार स्वर्णमान का मुख्य गुण यह है

कि क्या यह कुछ उतार-चढ़ाव पर निश्चित प्रतिबंध लगाता है?- बिल्कुल

ठीक।

6113 परंतु, वास्तव में, कुछ ऐसी चीजें हैं, उदाहरणार्थ टकसालों से प्रावधान इस

बात पर आधारित नहीं कि एक देश को कितनी मुद्रा की आवश्यकता

है?

-हां, मैं यह कह सकता हूं कि मैं स्वर्णमान के पक्ष में केवल इसलिए

हूं क्योंकि क्षतिपूरक, प्रणाली व्यवहार्य नहीं है। यदि वह प्रणाली व्यवहार्य

होती, तो मैं स्वर्णमान को एकदम अस्वीकार कर देता। मेरा इससे बिल्कुल

प्रेम नहीं है।

6114 स्वर्णमान व्यापार प्रक्रिया के नतीजों में भी सुधार नहीं लाता।-नहीं।

6115 तब तो केवल एक बात है। पैरा 5 में आप यह कहते हैं, ‘‘मैं वास्तव में,

स्वर्णमान निधि के उन्मूलन के पक्ष में हूं, क्योंकि मुद्रा की स्थिरता को

बनाए रखने के लिए उसका कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं है।’’ अनुरूपता