भारतीय मुद्रा और वित्त के संबंध में 15 दिसम्बर, 1925 को शाही आयोग के समक्ष साक्ष्य - Page 359

344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सुधारों की शुरूआत की तो उन्होंने यह महसूस किया कि रुपये के विशाल

परिसंचरण के लिए उनके पास कोई निधि नहीं है। और फाउलर समिति

ने अपनी रिपार्ट के पैरा 60 में यह सुझाव दिया कि यदि सरकार रुपये

के सिक्के बनाती है और लाभों को अपने लिए रखती है तो उस लाभ

का उपयोग एक निधि के रूप में किया जाना चाहिए। सर एडवर्ड लॉ ने

भी जो 1901 में उस समय दृश्यपटल पर आया था जब रुपये के सिक्कों

की ढलाई आरम्भ हुई थी, यह महसूस किया कि रुपये की मात्रा इतनी

विशाल हो गई है कि निधि की कुछ मात्रा का होना आवश्यक है और

मेरा विचार है कि वह रुपये के सिक्के केवल इसलिए ढालता चला गया

क्योंकि उसने यह महसूस किया कि निधि की आवश्यकता है और निधि

को रुपये के सिक्के बनाने के अलावा किसी और प्रकार से नहीं बनाया

जा सकता।

6120 क्या आप केवल ऐसा सोचते हैं?- नहीं, मेरी बात तो यह है_ मैंने उस

विज्ञप्ति को बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ा है और मैं यह महसूस करता हूं कि

सर एडवर्ड लॉ ने वहां यह स्पष्ट कर दिया था कि रुपये के सिक्के का

निर्माण अधिमूल्य पर इसलिए किया गया था क्योंकि लोग सोने या किसी

अन्य वस्तु का मुद्रा में प्रयोग नहीं करना चाहते थे, फिर मैं इस बात को

समझ सकता था कि रुपये के सिक्के का निर्माण लोगों की मांग के उत्तर

में किया गया। परंतु विज्ञप्ति में इस संबंध में कोई भी बात नहीं मिली।

वह केवल यह कहता है कि जब हमने सुधारों की शुरूआत की तब हमने

फाउलर समिति की रिपोर्ट के पैरा 60 का ध्यान नहीं रखा।

6121 परंतु, मेरा विचार है कि उस विज्ञप्ति में जिसका आप उल्लेख कर रहे हैं,

उसने यह कहा कि अनुमानतः 70 लाख या लगभग उसी के समान एक

स्वर्णनिधि होनी चाहिए। इसके विपरीत आप यह कहते हैं कि वह रुपये

जारी कर रहा था?

-बिल्कुल ऐसा ही है। स्वर्णमान निधि को सोने में रखा जाता है। मैं यह

कहता हूं कि किसी प्रकार की निधि की आवश्यकता नहीं थी।

6122 डॉक्टर अम्बेडकर, आप यहां एक सामान्य बयान देते हैं, ‘‘दुर्भाग्यवश भारत

में मुद्रा प्रणाली के इतिहास में ऐसी विकृति के प्रचुर प्रमाण हैं। हमारे यहां

पहले ही मूर्ख प्रशासक थे जो इस विचार से अभिभूत थे कि आरक्षित

निधि का होना बहुत ही आवश्यक बात है और वे किसी और बात को