भारतीय मुद्रा और वित्त पर शाही आयोग के समक्ष साक्ष्य
345
ध्यान में रखे बिना, मुद्रा जारी करते रहे, परन्तु केवल आरक्षित निधि को
बढ़ाने के लिए उन्होंने ऐसा किया’’ और आप उसे अब अध्यक्ष के सामने
दोहरा रहे हैं?- स्वयं प्रोफेसर केनन ने अपनी पुस्तक में जो बात कही है,
उसकी तुलना में मैंने बहुत नम्र बात कही।
6123 परंतु क्या वह बात नहीं है जो 1895 में वास्तव में, बम्बई के एक सुप्रसिद्ध
फाइनेंशियर द्वारा सुझाई गई थी और उसे उस समय वित्त सदस्य द्वारा
अस्वीकार कर दिया गया था?- उसका पता मुझे विज्ञप्ति से चलता है।
6124 जरा ठहरिए। अपनी पुस्तक में क्या आपने वास्तव में, बंबई के उस
फाइनेंशियर का नाम दिया है, जिसने इस बात का सुझाव दिया था और
भारत सरकार के उस वित्त मंत्री का नाम भी दिया है जिसने इसे अस्वीकार
कर दिया था?- हां।
6125 फिर, अपनी पुस्तक में आपने एक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ का नाम भी दिया
है जिसने अभी हाल में, 1907-08 में उसी बात का सुझाव दिया है और
उसे भारत सरकार द्वारा पुनः अस्वीकार कर दिया गया है और 1919 के,
हाल ही के एक दूसरे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री का उल्लेख किया है। फिर,
आप अध्यक्ष के समक्ष बयान को क्यों दोहराते हैं कि भारत सरकार के
प्रशासकों ने इस सुझाव को छोड़ा या अस्वीकार नहीं किया है जबकि
वास्तव में, आप यह जानते हैं कि इस सुझाव को जब सुप्रसिद्ध वित्त
विशेषज्ञों (फाइनेंशियरों) द्वारा प्रस्तुत किया गया तभी भारत के प्रशासकों
ने इसे बार-बार अस्वीकार कर दिया?- इसके लिए मेरा उत्तर यह है कि
यदि आप प्रत्येक वित्त मंत्री द्वारा बजट में दिए गए भाषणों को किसी
प्रकार पढ़ें। उदाहरणार्थ, अब मैं उस सज्जन का नाम भूल गया हूं, जिसने
एडवर्ड लॉ से पहले यह बात कही थी। मेरा ख्याल है कि मैं उदाहरण दे
सकता हूं।
6126 सर जेम्स वेस्टलैंड तथा सर क्लिंटन डॉकिन्स।
- परंतु वे उससे कभी सहमत नहीं हुए।
6127 नहीं, इसका सुझाव वेस्टलैंड को एक भारतीय द्वारा दिया गया था। उसने
उस सुझाव को अस्वीकार कर दिया फिर डॉकिन्स को दिया उसने भी इसे
अस्वीकार कर दिया था?
- आपकी व्याख्या का मैं उचित सम्मान करता हूं, सर एडवर्ड लॉ ने
कहा कि इतना स्वर्णमान होना चाहिए जो सब रुपयों तथा नोटों के पीछे
समर्थन के लिए पर्याप्त हो। मैं इस बात से इनकार नहीं करता। परंतु मैं