दोहरे मानक से रजत मानक तक
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मामला नहीं हो सकता था क्योंकि माध्यम धातु की सिक्केनुमा वस्तु थे। परंतु यह याद रखना है कि भारत में सिक्कों का परिचालन सिक्कों की बारिकी और वैधता में भिन्नता के कारण सिक्कों के वे विभिन्न प्रकार निर्मित किए गए जो किसी विशेष प्रकार के सिक्कों के प्रति विनिमय द्वारा लेन-देन को आवश्यक रूप से बंद नहीं कर पाए, कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में सिक्का एक ऐसा बीच का माध्यम बन गया जिससे पुनः अन्य से अदला-बदली हो सकती थी और यह क्रम तब तक चलता रहता जब तक सिक्के का वांछनीय प्रभार प्राप्त न होता। यह पर्याप्त संकेत है कि समाज अदला-बदली की स्थिति में डूब गया था। यदि इस स्थिति में इतनी ही कमी होती तो यह कमी उतनी ही खराब होती जैसी कि सिक्कों की विविधता के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की होती है, परंतु इसमें इस तथ्य से अधिक जटिलता आ गई कि यद्यपि सिक्कों के मूल्य-वर्ग समान थे तथापि सिक्कों में धातुओं की मिलावट में काफी अंतर था। इस कारण एक सिक्के पर छूट बढ़ौती उसी प्रकार के व उसी नाम की तुलना में निर्धारित किया जाता था। कितनी छूट या बढ़ोतरी मिलेगी इस ज्ञान के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति को इस बात का ध्यान रखना होता था कि वह उसी प्रकार के सिक्के प्राप्त करे जो वह जानता है तथा जो उसके राज्य क्षेत्र में प्ररिचालित हैं। कुल मिलाकर ऐसी स्थिति से उत्पन्न वाणिज्य की बाधाएं उन बाधाओं से कम न हो सकी जो लाइकरगम के अध्यादेश से उत्पन्न हुई थी जिसने लेसडेमोनिनों को लोहे की मुद्रा उपयोग करने के लिए बाध्य कर दिया था ताकि उसका भार उन्हें अधिक व्यापार करने से रोक सके। यह स्थिति खीझ उत्पन्न करने के अतिरिक्त कटुता के कारण अधिक गंभीर हो गई थी। मुद्रा के उपलब्ध कराने में निवेश की गई पूंजी समुदाय के उत्पादनशील संसाधनों पर लगाया गया कर होती है फिर भी जेम्स विलसनऽ ने जो कुछ भी लिखा है उस पर कोई भी प्रश्न नहीं उठ सकताः-
‘‘कि समय और श्रम में सिक्के की मध्यस्थता से जो बचत होती है वस्तुओं
की अदला-बदली की पद्धति की तुलना में उत्पादनशील संसाधनों से ली गई
पूंजी के भाग के लिए पर्याप्त पारिश्रमिक निर्धारण करता है जिससे वस्तुओं के
एकाकी परिचालन में कार्य करे और देश की अवशेष पूंजी को अधिक उत्पादन
के काम में ला सकें।’’
इसके बाद उस मुद्रा-पद्धति के बारे में क्या कहा जाए जिसने अदला-बदली के दुष्परिणामों को दूर नहीं किया जबकि उत्पादनशील स्रोतों से बहुत बड़ी पूंजी हटा ली गई जो वस्तुओं के एकाकी परिचालक के रूप में काम कर सके? दूषित मुद्रा, मुद्रा के अभाव से कहीं अधिक खराब होती है। मुद्रा का अभाव कम से कम लागत की
ऽ कैपीटल करैंसी एंड बैंकिंग, 1847 पृष्ठ 15