1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 37

22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

रक्षा करता है परंतु समाज के पास मुद्रा होनी चाहिए और यह उत्कृष्ट मुद्रा होनी चाहिए। निकृष्ट मुद्रा से उत्कृष्ट मुद्रा पैदा करने का कार्य-भार ईस्ट इंडिया कंपनी के कंधों पर पड़ा जो इस बीच भारत में मुगल साम्राज्य की उत्तराधिकारी बन गई थी।

सर्वप्रथम 25 अप्रैल, 1806ऽ को कम्पनी के निदेशकों ने अपनी प्रसिद्ध विज्ञप्ति द्वारा सुधार के आधार व्यक्त किए जो उन्होंने भारत में अपने राज्य क्षेत्र के प्रशासकीय प्राधिकारियों को भेजे। इस ऐतिहासिक विज्ञप्ति में कंपनी के निदेशकों ने कहाः-

‘‘17. यह एक मत है जिसका समर्थन सर्वोत्तम प्राधिकारियों द्वारा किया गया है

और जो अनुभव से यह सिद्ध हुआ है कि सोने और चांदी के सिक्के निर्धारित

तुलनात्मक मूल्यों के आधार पर भुगतान करने के लिए वैध सिक्के के रूप में

प्रचलित नहीं किए जा सकते_.......बिना हानि के या इस हानि का कारण उन

धातुओं के समय-समय पर परिवर्तित मूल्यों का होना है जिनसे इन सिक्कों का

निर्माण होता है। सोने और चांदी के सिक्के का अनुपात कानून द्वारा निर्धारित

किया जाता है और यह धातुओं के मूल्य के अनुसार होता है तथा यह सबसे

न्यायपरक सिद्धांतों पर आधारित हो सकता है, परंतु बदलती हुई परिस्थितियों के

कारण चांदी की तुलना में सोने का अधिक मूल्य हो सकता है। उसकी तुलना

में जब इन दोनों के बीच अनुपात निर्धारित किया था। इसलिए यह लाभप्रद हो

जाता है यदि चांदी या सोने का विनिमय किया जाए ताकि धातु का बना सिक्का

परिचालन से हटा लिया जाए और यदि सोने की तुलना में चांदी के मूल्य में

वृद्धि हो तो इन्हीं परिस्थितियों में चांदी के सिक्के की मात्रा परिचालन में कम हो

जाएगी । चूंकि इन दोनों धातुओं के मूल्य की घटा-बढ़ी को रोकना संभव नहीं है

अतः इन धातुओं से बने सिक्कों से उभरते परिणामों को बचाना भी अव्यावहारिक

है धातुओं के मूल्यों में घटा-बढ़ी के अनुसार सोने और चांदी के सिक्कों के

तुलनात्मक मूल्यों के समायोजन से अनवरत कठिनाइयां उत्पन्न होंगी और इस

प्रकार के सिद्धांत की स्थापना से सदैव असुविधा और हानि उत्पन्न होगी।’’

इसलिए उन्होंने भविष्य में भारतीय मुद्रा के लिए एक ही धातु के बने सिक्कों के पक्ष में अपने मत की घोषणा की और यह निर्धारित कियाः-

‘‘21.... कि चांदी (भारत में) लेखा की व्यापक मुद्रा होनी चाहिए और वे सभी लेखे रुपये, आने और पैसे के मूल्य-वर्ग में रखे जाने चाहिए। फिर भी रुपया वैसा नहीं रहा जैसा कि मुगल सम्राटों ने भार और बारीकी की दृष्टि से उसे ढाला था। प्रस्ताव कि ‘‘9.....नया रुपया....... का कुल भार होगाः-

ऽ एच.ऑफ सी.रिटर्न, 127, 1898