दोहरे मानक से रजत मानक तक
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ट्राय ग्रेन 180
1/12 मिश्र धातु को घटाइए 15
और शुद्ध चांदी ट्राय ग्रेन में मिश्रण 165
यही वे प्रस्ताव थे जो निदेशक मंडल (कोर्ट ऑफ डायरेक्टर) ने भारतीय मुद्रा के सुधार के लिए प्रस्तुत किए।
180 ग्रेन ट्राय भार के रुपये तथा भारत की भावी मुद्रा पद्धति के लिए यूनिट के रूप में 165 ग्रेन शुद्ध चांदी का मिश्रण तर्कसम्मत विकल्प था।
रुपये का इस विशेष भार के चयन का मुख्य कारण इस इच्छा को व्यक्त करता है कि प्रचलित व्यवस्था से कम से कम भिन्नता होनी चाहिए। उन्होंने इस बात का प्रयास किया कि सिक्कों को द्विधातु के आधार पर बनाए रखने की मुगलों की अव्यवस्थित मुद्रा पद्धति को व्यवस्थित किया जाए। अतः तीन प्रेसीडेंसियों की सरकारों ने पहले ही अपने व्यय क्षेत्रों में विनिमय के लिए देश में विरल माध्यम के रूप में परिचालित सोने और चांदी के सिक्कों का चयन किया। चयन किए गए सिक्कों के भार और बारीकी को मुद्रा की प्रमुख यूनिटों के अन्य विवरण संक्षिप्त तालिका 1 (पृष्ठ 10) में देखा जा सकता है।
अलग-अलग प्रेसीडैंसियों की मुख्य इकाइयों को प्रमुख एकल इकाई में परिवर्तित करने के लिए सबसे निकट और सबसे कम असुविधाजनक भारत की ऐसी मात्रा स्पष्टतया 180 ग्रेन जो एक ही समय में पूर्ण सांख्यिक होगी क्योंकि किसी उल्लिखित डिग्री में वर्तमान इकाइयों में से किसी भी इकाई के भार से किसी भी मामले में अलग नहीं थी। इसके अतिरिक्त यह विश्वास किया गया था। कि 180 अथवा 179. 5511 ग्रेन उस रुपये के सिक्के का मानक भार था जो मूलतः मुगल टकसालों से जारी किया गया था। अतः इसका अंगीकार वस्तुतः पुरानी इकाई की ही पुनरावृत्ति थी और यह एक नवीनऽ इकाई का प्रवेश नहीं था। 180 ग्रेन की इकाई के पक्ष में एक अन्य लाभ का दावा यह था कि इस प्रकार की मुद्रा की इकाई फिर से वही बन जाएगी जो बंद हो गई थी और इस इकाई का वही भार होगा। यह सहमति व्यक्त की गई कि भारत में पहले सभी भार की इकाई मुख्य सिक्के की इकाई से सम्बद्ध रही इसलिए सेर और हाथ के भार रुपये के गुणांक रहे जिनका मूलतः भारत 179.6 ग्रेन ट्राय रहा। यदि मुख्य सिक्के के भार को 180 ग्रेन ट्राय से अलग स्थापित किया जाना था तो यह विश्वास किया जाना था कि यह स्थिति उस प्राचीन प्रथा के बदलाव से कोई अच्छी नहीं होती जो अन्य भारों और मापन के आधार सिक्के के भार के
ऽ देखिए पैरा 26-28, कलकत्ता, टकसाल समिति के जेम्स प्रिंसैप का पत्र। इस पत्र का प्रकाशन 1836
में कलकत्ता के जॉन मूलर द्वारा किया गया जो भारतीय तालिकाओं के परिशिष्ट में दिखाया गया है।