362 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रूप में परिवर्तनीय है और आप इस मुद्रा को निर्यात खरीद के लिए सोने
में परिवर्तनीय बना सकते हैं। अब, उस मान को लेकर, मुझे बहुत प्रसन्नता
होती यदि आप हमें यह बताएंगे कि ऐसे मान में स्थिरता को बनाए रखने
की योग्यता स्वर्णमान की अपेक्षा कम क्यों होती है? महोदय, मैं आपके
प्रश्न को समझ गया और इस विषय में मेरा उत्तर यह है। परिवर्तनीयता,
मुद्रा की मात्रा को देश की आवश्यकताओं तक सीमित करने का एक
साधन है जिस परिवर्तनीयता का अभिप्राय केवल बाह्य कार्यों के लिए
होता है, उसमें उस मुद्रा की मात्रा को सीमित करने की पर्याप्त क्षमता
नहीं होती। फलतः, ऐसी मुद्रा पर आप आंतरिक मूल्यों को स्थिर नहीं रख
सकते।
6242 आप यह क्यों कहते हैं कि उसमें आंतरिक कार्यों के लिए परिवर्तनीयता की
अपेक्षा कम क्षमता होती है?- क्योंकि प्रभावी होने के लिए परिवर्तनीयता,
पूर्ण होनी चाहिए।
6243 परन्तु क्या यह पूर्ण है?- नहीं है।
6244 परन्तु प्रकट रूप में यह पूर्ण है। इसमें अंतर केवल यह है कि एक मामले
में आप अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा को अंतर्राष्ट्रीय कार्य के लिए परिवर्तित करते हैं
और दूसरे मामले में, आप उसे या तो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के लिए बदलते
हैं जिसका प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय रूप में होता है या अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के लिए
करते हैं जिसका देश के अंतर परिसंचरण है। - नहीं, नहीं, बात यह है।
जब आपका दायित्व, परिवर्तनीयता के लिए, अपूर्ण हो जैसा कि विनिमय
मान के मामले में है तो बिना किसी भय के अपेक्षाकृत अधिक मुद्रा को
जारी करने की संभावना होती है।
6245 परन्तु आपने अभी कहा कि परिवर्तन करने का दायित्व दोनों मामलों में
निर्गम को सीमित कर देता है?- हां, परन्तु परिवर्तन करना, परिवर्तनीयता
के साधन की क्षमता पर निर्भर होता है। यदि आपकी परिवर्तनीयता संपूर्ण
है, अर्थात यदि निर्गमकर्ता के समक्ष जब भी उसकी मुद्रा प्रस्तुत की जाती
है तो वह उसे बदलने के लिए बाध्य है तब परिवर्तनीयता संपूर्ण होती
है।
6246 परन्तु मेरा प्रस्ताव यह था कि स्वर्ण विनिमय मान निर्गम करने वाले
प्राधिकारी को आंतरिक सांकेतिक मुद्रा को बाह्य कार्यों के लिए सोने में
बदलने के लिए बाध्य करता है?- और सब कार्यों के लिए नहीं।