भारतीय मुद्रा और वित्त के संबंध में 15 दिसम्बर, 1925 को शाही आयोग के समक्ष साक्ष्य - Page 379

364 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

6255 क्या आप उसे यहां जारीकर्ता के विवेक पर नहीं रखेंगे?- हां, परंतु यहां

पह यह परिवर्तनीयता ही विवेक को नियंत्रित करती है। परिवर्तनीयता एक

साधन है जिसके द्वारा जारीकर्ता की इच्छा नियंत्रित होती है। इसमें कोई

खतरा नहीं होगा। यद्यपि मैं यह स्वीकार करता हूं कि स्वर्णमान के अंतर्गत

भी सोना निबंधित रूप में बाहर जा सकता है और देश में केवल कागजों

के नोटों की बाढ़ आ सकती है।

6256 क्या आप यह कहेंगे कि दो निर्धारित स्वर्ण बिन्दुओं पर एक अंतर्राष्ट्रीय

मुद्रा में परिवर्तन करने का दायित्व मुद्रा की स्थिरता को सुनिश्चित करने

के लिए पर्याप्त होती है। क्योंकि यदि आप आंतरिक रूप में मुद्रा अधिक

जारी कर देते हैं तो क्या आपके रुपये का सोने के परिप्रेक्ष्य में अवमूल्यन

हो जाएगा?- हां, मैं इसे स्वीकार करता हूं, परंतु यह बहुत दिन बाद होगा।

ऐसा होने से पहले, बहुत बड़ा अंतराल होगा और कुछ देशों में हो सकता

है ऐसा न भी हो।

6257 यूरोप तथा अन्य देशों में युद्ध से पहले स्वर्णमान कैसे काम करता था?

- यह परिवर्तनीयता के आधार पर काम करता था, परिवर्तनीयता केवल

बाह्य कार्यों के लिए ही नहीं थी।

6258 परन्तु क्या उस मान को केन्द्रीय बैंकों द्वारा मुख्य रूप से सफल नहीं किया

गया जो सोने में परिवर्तन नहीं कर रहे थे किन्तु विदेशी मुद्रा को रख रहे

थे और क्या केवल अंतिम उपाय के रूप में सोने का प्रवाह एक केन्द्र

से दूसरे की ओर जा रहा था?- परन्तु परिवर्तनीयता की दृष्टि से उनकी

व्यवस्था पूर्ण तथा अबाध थी।

6259 आप यह भी जानते हैं कि यूरोप महाद्वीप पर अनेक बड़े देशों के पास

पूर्णतया स्थिर मुद्रा थी, उनके पास व्यावहारिक रूप में परिसंचरण के लिए

सोना नहीं था?- हां ऐसा ही था।

6260 (अध्यक्ष) डॉक्टर अम्बेडकर, आज आपने हमें अत्यंत सहायता व सहयोग

दिया है, इसके लिए हम आपके बहुत आभारी हैं।

(गवाह चला जाता है)