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भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या-1ऽ
2 शिलिंग बनाम 1 शिलिंग 4 पैंस का अनुपात
यूरोप का महान युद्ध, हमारी स्मृति में सबसे असाधारण घटना थी। इस घोर विपदा के दौरान, उसके प्रभाव से ऐसी कोई चीज अछूती नहीं बची जो अस्त-व्यस्त न हुई हो। परंतु जितनी चीजों पर इसका प्रभाव पड़ा उनमें इतना भारी आघात किसी को नहीं पहुंचा, जितना मुद्रा प्रणाली को पहुंचा था। आज यह पता चलता है कि जर्मन मार्क, आस्ट्रियन क्राउन, रूस का रूबल, फ्रांस का फ्रैंक तथा इटली का लीरा विश्व की गणना की उल्लेखनीय कुछ मुख्य इकाइयों ने अपना आधार खो दिया और उन्होंने अपनी मूल सममूल्यता से दूर तक एक लम्बी-चौड़ी यात्रा की है। यहां तक कि ब्रिटेन का पाउंड भी इसका शिकार बना और रुपया जो कुछ भी युद्ध की चपेट में नहीं आया था उन बंधनों से बच निकला जिनका प्रबंध उसके संरक्षकों द्वारा उसे स्थिर रखने के लिए किया गया था।
युद्ध के बंद होने के बाद किए गए पुनर्निर्माण की अवधि में, ऐसे लोगों का पता लगाना स्वाभाविक था जो मुद्रा की युद्ध से पूर्व की स्थिति पर लौटने के इच्छुक हों। इस सार्वभौमिक मांग की सहानुभूति में भारत में उसके पक्ष में एक निश्चित कायक्रम वाली एक दल का उदय हुआ है। इस दल की राय में भारतीय मुद्रा रुपये के प्रति 1 शि. 4 पैंस के अनुपात पर स्थिर होनी चाहिए। यह अनुपात भारतीय मुद्रा का युद्ध से पूर्व था। भारत सरकार इस मांग के विरूद्ध प्रतीत होती है, इस कारण से नहीं कि वह अनुपात अच्छा नहीं है, बल्कि, इस कारण है कि उसकी राय में वह अनुपात अधिक अच्छा नहीं है। वह यह चाहती है, बल्कि उसका लक्ष्य यह है कि भारतीय मुद्रा के लिए 2 शिलिंग का अनुपात रखा जाए। जैसा कि प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि यूरोप में अनेक सरकारें, ऐसा बुद्धिमानीपूर्ण कार्य करने के अलावा, वास्तव में इस बात के लिए आभार प्रकट करेंगी, यदि वे अपनी मुद्राओं के युद्ध से पूर्व के अनुपातों को
ऽदि सर्वेंट ऑफ इंडिया-1 अप्रैल, 1925