भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या-1st April 1925 - Page 381

366 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पुनःस्थापित कर सके। अभी तक वे उनसे दूर हैं। इसके विपरीत भारतीय मुद्रा अपने युद्ध से पूर्व के अनुपात पर पहले ही पहुंच गई हैं। इस दृष्टि से, चूंकि भारत सरकार युद्ध से पूर्व की स्थिति पर लौटने से संतुष्ट न होने की प्रवृत्ति, एक शरारती बच्चे की प्रवृत्ति जैसी प्रतीत होती है जो हमेशा और अधिक मांगता रहता है।

इस विवाद को ही मैं अपने इस लेख का विषय बनाना चाहता हूं। सर्वप्रथम इस बात को समझ लेना आवश्यक है कि इस विवाद में दो अलग-अलग प्रश्न निहित हैं, (1) क्या हमें अपने विनिमय को स्थिर करना चाहिए, और (2) वह अनुपात क्या हो, जिस पर हम स्थिर करें। ये दो अलग-अलग प्रश्न हैं। परंतु जब कोई इस बात का अध्ययन करता है कि दो पक्षों को क्या कहना है तो उसे पता चलता है कि न तो सरकार ने और न उसके विरोधियों ने ही इस बात को स्पष्ट किया है कि क्या उनका लक्ष्य हमारी गणना की इकाई के मूल्य को बदलना है अर्थात उसका नया मूल्य रखना है या उसको उसके वर्तमान मूल्य पर स्थिर करना है। मुझे भय है कि जब तक इन दो प्रश्नों को पूर्णतया पृथक नहीं किया जाएगा, तब तक हमारी मुद्रा के पुनर्वास की दिशा में बहुत कम प्रगति हो सकती है। क्योंकि उस मुद्रा के मूल्य को केवल बदलने का ही लक्ष्य नहीं है कि जो लोग मुद्रा के मूल्य को बदलना चाहते हैं वे अंत में, जब वांछित मूल्य प्राप्त हो जाए तो उसके बाद उसे स्थिर करना चाहते हैं। परंतु जहां तक संक्रमण काल का संबंध है, उसके विषय में यह कहना है कि हम उसको स्थिर कर रहे हैं जबकि हम मुद्रा के मूल्य को बदल रहे हैं यह एक भ्रम फैलाने वाली बात है क्योंकि दूसरी अवस्था में एक सुविचारित नीति शामिल है, जबकि पहली अवस्था का अभिप्राय उसे स्थायी रखने की सुविचारित नीति है।

इन दो अलग-अलग प्रश्नों का विवेचन आरंभ करने से पहले, मेरे विचार से, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि हम इस बात को ठीक-ठीक समझ लें कि विनिमय अनुपात कैसे निर्धारित किया जाता है। क्योंकि जब तक हम इसे पूर्ण रूप से नहीं समझते तब तक हम इस विवाद में से उत्पन्न होने वाले दो प्रश्नों के अर्थ तथा आशय को ठीक-ठीक समझदारी से कभी भी नहीं समझ सकते। इसे सरल भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है। गणना की इकाइयों या दो मुद्राओं के बीच विनिमय के अनुपात का अर्थ दूसरे के रूप में एक का मूल्य होता है। जब, गणना की एक इकाई, गणना की दूसरी इकाई के रूप में मूल्य होती है वह उस समय तक स्वयं अपने लिए नहीं होती जब तक उसे एक कलाकृति के रूप में न चाहा गया हो बल्कि उसके लिए होती है जिसे वह खरीदती है। इसलिए ठोस रूप में विषय की शुरूआत करने के लिए, हम कह सकते हैं कि अंग्रेज भारतीय रुपये का मूल्य उतना ही मानेगा जितना जहां तक वह रुपये भारतीय माल से खरीद सकेगा। दूसरी तरफ, भारतीय, ब्रिटिश पाउंड का उतना ही मूल्य लगाएंगे जैसे वे जितने पाउंडों से ब्रिटिश