भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या-1st April 1925 - Page 382

भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या

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माल खरीदा जा सकेगा। अतएव इससे यह बात समझ में आती है कि यदि भारत में रुपये की क्रय शक्ति बढ़ती है, जबकि इंग्लैंड में पाउंड की क्रयशक्ति गिरती है। (अर्थात, भारतीय मूल्य स्तर, ब्रिटिश मूल्य स्तर के सापेक्ष गिरता है) तो पाउंड के मूल्य के बराबर थोड़े से ही रुपये होंगे। दूसरे शब्दों में, जब भारत में रुपये में मूल्य गिरेगा तो पाउंड के रूप में रुपये का विनिमय मूल्य बढ़ेगा। दूसरी ओर, यदि भारत में रुपये की क्र्रय शक्ति गिरती है, जबकि इंग्लैंड में पाउंड की क्रय शक्ति बढ़ती है या स्थिर रहती है अथवा कम तेजी से गिरती है। अर्थात यदि भारतीय मूल्य स्तर की तुलना में बढ़ता है तो रुपये के मूल्य के बराबर अपेक्षाकृत पाउंड कम होंगे। दूसरे शब्दों में, जब भारत में रुपये में कीमतें गिरेंगी तो रुपये के विनिमय मूल्य में पाउंड के संदर्भ में बढ़ोत्तरी होगी। इसके विपरीत यदि भारत में रुपये की क्रय शक्ति घटती है जबकि इंग्लैंड में पाउन्ड की क्र्रय शक्ति बढ़ती है या वह यथास्थिति रहती है या कम जल्दी से गिरती है (अर्थात यदि भारतीय मूल्यों का स्तर अंग्रेजी मूल्यों के स्तर के संबंध में बढ़ता है) थोड़े से पाउंड ही से काम चल जाएगा। रुपये के संदर्भ में दूसरे शब्दों में जब-जब भारत में रुपये का मूल्य बढ़ेगा तो रुपये का विनिमय मूल्य गिर जाएगा। इससे हम एक सामान्य तर्क के रूप में यह निर्धारित कर सकते हैं कि गणना की दो इकाइयों का विनिमय अनुपात के साथ सममूल्य पर होता है। संक्षेप में, यह क्रय शक्ति की सममूल्यता का सिद्धांत है जो गणना की दो इकाइयों या दो मुद्राओं के बीच एक विशेष विनिमय अनुपात के एक स्पष्टीकरण के रूप में है। मैं इस सिद्धांत की एक मजबूत पकड़ पर बल देता हूं क्योंकि मैं देखता हूं कि हमारे कुछ प्रबुद्ध लोगों का यह मत प्रतीत होता है कि एक विशेष विनिमय अनुपात, व्यापार के संतुलन का परिणाम होता है। इस दृष्टिकोण को एक प्रकार से समझना कठिन है। क्योंकि वास्तव में, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में, जिसमें निर्यात-आयात के लिए भुगतान करता है, बिना भुगतान के शेष जैसी कोई चीज कभी भी नहीं छोड़ी जाती। यह सच है कि व्यापार के खर्च के एक भाग का भुगतान रुपये मुद्रा द्वारा किया जाता है, परंतु इसका कोई कारण नहीं कि रुपये द्वारा चुकाए गए भाग को शेष क्यों कहा जाए। इस सबका अभिप्राय यह है कि मुद्रा का प्रवेश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में, अन्य वस्तुओं के प्रवेश की तरह ही होता है। उसमें मुद्रा के संबंध में कोई विलक्षण बात नहीं है। उस सीमा तक, विभिन्नता में कोई ऐसी विलक्षण बात नहीं है जिस तक मुदा अंतर्राष्ट्रीय सौंदों में प्रवेश करता है। जिस सीमा तक मुद्रा एक देश के व्यापार के लेन-देन में प्रवेश करता है, वह एक सापेक्ष मूल्य के उसी नियम द्वारा नियंत्रित होता है जैसा किसी अन्य वस्तु के मामले में होता है। जो वस्तु सापेक्ष रूप में सबसे सस्ती होती है, उसकी प्रवृत्ति प्रायः देश के बाहर जाने की होती है। एक समय यह छुरी-कांटा हो सकता है, दूसरे समय संतरे हो सकते हैं और तीसरे समय पर धन हो सकता