368 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है। यदि कोई व्यक्ति छुरी-कांटे या संतरे के रूप में व्यापार के संतुलन के विषय में कहता है, जैसा एक व्यक्ति भली-भांति कह सकता है, जबकि एक सामान्य संतुलन की एक अवस्था के बाद, वे उनमें से पहले की अपेक्षा अधिक बाहर जा सकती है। सामान्य संतुलन की एक अवस्था के बाद, जब पहले की अपेक्षा और अधिक धन देश से बाहर जाता है तो धन के रूप में व्यापार के संतुलन के विषय में कहने में न तो कोई तुक है और न कोई कारण है। तथापि, यह व्यवहार व प्रथा क्षम्य है, क्योंकि यह वाणिज्यवादी दिनों का हानिरहित अवशेष है। परंतु यह विचार बिल्कुल बेतुका तथा मूर्खतापूर्ण है कि गणना की एक इकाई के विनिमय अनुपात का निर्धारण उसकी क्रय-शक्ति द्वारा नहीं बल्कि व्यापार के संतुलन द्वारा किया जाता है। यह दृष्टिकोण कार्यक्रम का विशुद्ध व्युत्क्रमण है। यह सच है कि विनिमय में गिरावट के साथ-साथ एक प्रतिकूल व्यापार संतुलन और अनुकूल व्यापार संतुलन के कारण विनिमय मूल्य में वृद्धि होती है। परंतु इस अर्थ में कि वस्तुओं के निर्यात में गिरावट आ रही है, परंतु वस्तुओं के आयात में वृद्धि हो रही है, व्यापार के प्रतिकूल संतुलन का स्पष्ट अभिप्राय यह है कि एक विशेष देश एक ऐसा बाजार बन गया है जिसमें से यदि वस्तुओं की खरीद की जाएं तो अच्छा है परंतु उसमें वस्तुएं बेची जाएं तो वह बुरा है। इसी प्रकार इस अर्थ में कि वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि हो रही है, परंतु वस्तुओं के आयात में गिरावट आ रही है, व्यापार के अनुकूल संतुलन का स्पष्ट अभिप्राय यह है कि एक विशेष देश एक ऐसा बाजार बन गया है, जिसमें से यदि वस्तुएं
खरीदी जाएं तो अच्छा है परंतु यदि उसमें वस्तुएं बेची जाएं तो बुरा है। अब एक बाजार जो वस्तुओं को बेचने के लिए तो अच्छा होता है और यदि उसमें से वस्तुएं
खरीदी जाएं तो बुरा होता है (व्यापार के प्रतिकूल संतुलन के साथ विनिमय मूल्य में गिरावट के मामले का प्रतीक है) जब उस बाजार में स्तर का मूल्य नियंत्रण, बाहर के मूल्य नियंत्रण के स्तर की अपेक्षा नीचा होता है। यह केवल इस बात को दूसरे तरीके से कहता है कि निम्न मूल्यों का अभिप्राय उच्च विनिमय मूल्य तथा व्यापार का एक अनुकूल संतुलन है। और उच्चतर मूल्यों का अभिप्राय निम्न विनिमय मूल्य तथा व्यापार का प्रतिकूल संतुलन है। इस प्रकार व्यापार का संतुलन विनिमय मूल्य में परिवर्तन का परिणाम होता है इसके विपरीत नहीं और विनिमय मूल्य में विनिमय, मूल्य स्तर में परिवर्तन अर्थात गणना की इकाइयों की क्रय-शक्ति में परिवर्तन का परिणाम है। यह सबसे मौलिक तथ्य है और यद्यपि कुछ लोग शिशु को आहार देने के समान, इस विषयांतर पर अप्रसन्न हो सकते हैं, पर मेरे विचार से यह आवश्यक है। क्यांकि बहुत से लोग विनिमय के स्थिरीकरण तथा इच्छानुसार अनुपात पर विनिमय को स्थिर करने के संबंध में निराशाजनक अनापशनाप बातें करते हैं जैसे कि इसका मूल्यों के प्रश्न से कोई संबंध न हो। इसके विपरीत, विनिमय में परिवर्तन, अंततोगत्वा