भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या-1st April 1925 - Page 384

भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या

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मूल्य स्तर में परिवर्तन है और उसका लोगों के आर्थिक कल्याण पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। फिर यह याद करके कि विनिमय को नियंत्रित करना मुद्रा की क्रय शक्ति को नियंत्रित करने के समान ही है, हम आगे इस विवाद से उत्पन्न होने वाले दो प्रश्नों पर चर्चा करते हैं।

प्रथम, क्या हमें गणना की अपनी इकाई के विनिमय मूल्य को स्थिर करना चाहिए। जैसा कि मैंने ऊपर कहा है विदेशी विनिमय मूल्य में एक देश की मुद्रा की दूसरे देश की मुद्रा के साथ तुलना की जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि दो मुद्राओं के विनिमय केवल उन व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं जो उसी देश में खरीद तथा बिक्री का काम नहीं करते। फिर, उनके लिए इस बात का भी कोई महत्व नहीं कि विनिमय मूल्य क्या है, अर्थात रुपये का मूल्य 1 शि. है या 2 शि. बशर्ते कि यह आंकड़ा हमेशा वही हो और वह पहले से ज्ञात हो। निश्चित विनिमय मूल्य में केवल परिवर्तन या उतार-चढ़ाव का ही व्यापारियों के लिए कोई महत्व होता है। वह विनिमय की इस अपरिवर्तनीयता को ही चाहता है, इस अपरिवर्तनीयता को सुनिश्चित करना स्थिरीकरण की समस्या है। वर्तमान परिस्थितियों में, क्या अपने व्यापारियों को हम विनिमय अनुपात की इस अपरिवर्तनीयता की गारंटी दे सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए क्रय-शक्ति की समानता की मूल धारणा को विनिमय अनुपात के एक स्पष्टीकरण के रूप में याद करना चाहिए। इस सिद्धांत से यह स्पष्ट है कि यदि आप विनिमय को स्थिर करना चाहते हैं तो आपको संबंधित दो मुद्राओं की क्रय-शक्ति को नियंत्रित करना चाहिए ताकि उनकी गति गहराई में तथा दिशा में एक समान हो। इसलिए विनिमय को स्थिर करने के लिए हमारे पास नियंत्रण करने वाला कोई यंत्र होना चाहिए जो उसी दिशा में, दो मुद्राओं में समानुपाती परिवर्तनों को लाने वाले एक सामान्य नियामक के रूप में कार्य करेगा। अब तक, एक ऐसे अच्छे यंत्र का पता लगा लिया गया था और वह एक सामान्य स्वर्णमान था। उस मानक को संयुक्त राज्य को छोड़कर, समस्त संसार में नष्ट कर दिया गया। इसके फलस्वरूप, स्वर्णमान के आधार पर स्वयंचालित स्थिर विनिमय संयुक्त राज्य अमेरिका को छोड़कर अन्य देशों में इस समय असंभव है।

जहां तक उन देशों का संबंध है जिनका आधार कागज की मुद्रा है, विनिमय की स्थिरता केवल दो शर्तों पर प्राप्त की जा सकती है, (1) चूंकि हम अन्य देशों की मुद्रा को नियंत्रित नहीं कर सकते, अतः हमें उनकी मुद्रा की सहानुभूति में अपनी मुद्रा से काम चलाने के लिए तैयार रहना चाहिए और जब वे अपनी मुद्रा का मूल्य बढ़ाने के लिए तैयार रहना चाहिए। (2) अपनी समूची मुद्रा से काम चलाए बिना, हमें विदेशी विनिमय को एक निश्चित अनुपात पर बेचने तथा खरीदने के लिए तैयार रहना चाहिए। विनिमय की अपरिवर्तनीयता को प्राप्त करने के लिए मेरे विचार से, इन