भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या-1st April 1925 - Page 385

370 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दोनों परियोजनाओं को हानिकारक तथा खतरनाक मानकर अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि और कोई चीज नहीं केवल स्थिरीकरण ही अंतर्राष्ट्रीय बाजार के पुनरूद्धार को तथा उन स्थानों पर पूंजी की गतिशीलता को बढ़ायेगा जहां पर इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। उसके कारण युद्ध से पूर्व के संगठन का एक सबसे महत्वपूर्ण भाग पुनःस्थापित किया जाएगा और उससे अनिश्चितता समाप्त हो जाएगी। जिन बाजारों को अपने लिए बंद समझकर छोड़ दिया गया था, उनको पुनः पोषित किया जाएगा जिससे व्यापार तथा उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा। परंतु इसमें संदेह नहीं, कि इससे जो लाभ प्राप्त होगा वह उसमें हुए लागत के अनुरूप नहीं होगा। हमारे बाह्य लेन-देन हमारे आंतरिक लेन-देन की तुलना में अत्यल्प हैं। बाह्य सममूल्यता को सुरक्षित रखने के लिए अपने मूल्य-स्तर में निरंतर परिवर्तन द्वारा आंतरिक व्यवस्था को बिगाड़ना उस उपलब्धि का बहुत बड़ा मूल्य है जो कि बिल्कुल नगण्य है। क्योंकि हमारे व्यापारियों को यह याद रखना चाहिए कि यद्यपि स्थिरता एक बहुत बड़ी सुविधा है, फिर भी, उसके न होने से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को जारी रहने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं लग जाता, हमारी अपनी मुद्रा के इतिहास में इसका एक उदाहरण है। 1872-1892 के बीच, दो पूर्ण दशाब्दियों के दौरान, भारतीय मुद्रा में सबसे अधिक घट-बढ़ हुई। फिर, जैसा इस समय है, हमारे व्यापारियों ने विनिमय की अस्थिरता के विरूद्ध शोर मचाया, क्योंकि वह व्यापार के लिए बाधक थी। परंतु हमारा इतिहास यह दर्शाता है कि यहां तक कि अस्थिर विनिमय के अंतर्गत भी उन्होंने उन्नति की और वे फूले-फले यह आशा की जा सकती है कि उनके पुत्र भी अपने सहज ज्ञान से यह जान लेंगे कि वह कार्य कैसे किया जाता है। यदि यह दृढ़ीकरण करने में असफल हो जाएगा तो कोई भी हमारे मूल्य-स्तर की संचलन की सिफारिश करेगा भले ही इसमें हमारी मुद्रा का प्रबंध का मामला भी शामिल हो, क्या यूरोपीय देशों की सरकारें ऐसी निर्धन स्थिति में नहीं थीं। जैसा कि है, उनके मूल्य-स्तर की सहानुभूति में, अपने मूल्य-स्तर को उनके मूल्य स्तर के बराबर लाने की स्वीकृति देकर हम अपने कल्याण को दिवालिया सरकारों तथा उनके निराश मंत्रियों के भरोसे छोड़ देंगे। एक मुद्रा जिसकी विज्ञान द्वारा अनुमोदित आधार पर व्यवस्था की गई है निःसंदेह सर्वोत्तम कार्य करेगी। एक ऐसी मुद्रा के साथ उसके सम्बद्ध होना जिसकी व्यवस्था केवल व्यापार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए की जाती है, सहन किया जा सकता है। परंतु एक ऐसे भागीदार के साथ हाथ मिलाना हमारी मुद्रा की असहनीय व्यवस्था होगी जो स्वयं अपनी आजीविका के लिए अपनी मुद्रा पर आश्रित है।