भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या- 16th April 1925 - Page 386

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भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्याऽ

(2 शिलिंग बनाम 1 शिलिंग 4 पैंस का अनुपात)

अभी तक प्रथम प्रश्न के लिए, अब मैं इस विवाद से उत्पन्न दूसरे प्रश्न पर आया हूं यानि कि अपनी मुद्रा को हमें किस दर पर स्थिर करना चाहिए? क्रय-शक्ति के रूप में व्याख्या करने पर यह प्रश्न घटकर इस बात पर आ जाता है, क्या हम वर्तमान मूल्य स्तर में गिरावट लाएंगे, अर्थात क्रय-शक्ति को बढ़ाएंगे और उससे रुपये के विनिमय मूल्य में वृद्धि करेंगे? अब रुपये के मूल्य में परिवर्तन यदि सभी लेन-देन तथा सभी वर्गों को समान रूप में प्रभावित करते हैं तो उनका कोई परिणाम नहीं निकलेगा और ऊपर जैसे प्रश्न किसी प्रकार का विचार-विमर्श करने के योग्य नहीं होंगे। परंतु जैसा कि हम सब जानते हैं कि जब रुपये का मूल्य बदला है तो वह सब कार्यों के लिए एकसमान अनुपात में नहीं बदलता जिससे एक व्यक्ति की आय तथा उसके व्यय उसी सीमा तक प्रभावित हों। फलतः हमें उस दिशा में स्थिर करने से पहले जिसमें हमारा मूल्य स्तर जाना है, हमें यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि हमारे समाज के विभिन्न वर्गों के कल्याण पर उचित तथा न्यायसंगत प्रभाव पड़ेगा।

समाज के वर्तमान संगठन में, निवेश करने वाले वर्ग, व्यापारी वर्ग तथा कमाने वाले वर्ग में दोहरा वर्गीकरण, एक वास्तविक सामाजिक विभेद तथा हित के वास्तविक अंतर के अनुरूप होता है। तदैव, व्यापारी वर्ग, समस्त आर्थिक क्रिया-कलाप का केन्द्र है, एक ओर यह निवेश करने वाले वर्ग से रुपया उधार लेता है और दूसरी ओर यह कमाई करने वाले वर्ग को काम पर लगाता है वहीं एक संविदा तथा करार है कि कितने रुपये का भुगतान होगा। इन संविदाओं को करने के बाद यदि रुपये के मूल्य में, एक या दूसरे तरीके से परिवर्तन होता है, तो यह स्पष्ट है कि संविदा झूठी पड़ जाएगी यदि रुपये के मूल्य में गिरावट होती है, अर्थात यदि मूल्यों में वृद्धि होती है तो निवेश करने वाले तथा कमाने वाले वर्गों को हानि होती है और व्यापारी वर्ग को

ऽ दि सर्वेंट ऑफ इंडिया, 16 अप्रैल, 1925