372 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लाभ होता है। यह सच है कि निवेश करने वाला वर्ग तथा कमाने वाला वर्ग व्यापारी वर्ग से ठेके के रुपये की राशि प्राप्त करता है। परन्तु यह पता चलेगा कि मूल्यों की वृद्धि के कारण जब व्यापारी को रुपये के मूल्य के स्थिर रहते समय मिलने वाले रुपये की अपेक्षा अपने उत्पादन के लिए अधिक रुपया मिलता है तो वह अन्य वर्गों को केवल उतनी राशि का ही भुगतान नहीं करता बल्कि वह उनको अपेक्षाकृत कम मूल्य के रुपये का भुगतान करता है। इसी प्रकार, यदि रुपये के मूल्य में वृद्धि होती है अर्थात यदि मूल्यों में गिरावट आती है तो व्यापारी वर्ग को हानि होती है और निवेश करने वाले व कमाने वाले वर्ग को लाभ होता है। इसमें संदेह नहीं कि पहले की तरह ही, व्यापारी, निवेश करने वाले तथा कमाने वाले वर्ग को उतनी ही राशि का भुगतान करता है, जितनी के लिए उनके साथ संविदा की गई थी। परंतु यह पता चलेगा कि मूल्यों में गिरावट के कारण, जब व्यापारी को अपनी उपज के मूल्य के रूप में रुपये के मूल्य के स्थिर रहने की स्थिति में मिलने वाले मूल्य की अपेक्षा कम रुपया मिलता है, जब वह अन्य दो वर्गों को केवल उतनी ही राशि का भुगतान नहीं करता, बल्कि वह उनको अधिक मूल्य के रुपये का भुगतान भी कर रहा होता है।
तब स्पष्टतः यदि हम 2 शि. अनुपात की ओर नीचे की ओर अग्रसर होंगे अर्थात अपने मूल्यों में गिरावट लाएंगे तो हम अपने समाज के निवेशकर्ता तथा कमाई वाले वर्गों की सहायता करेंगे। इसके विपरीत, यदि हम 1 शि. 4 पैं. अनुपात की ओर अग्रसर होंगे तो हम अपने समाज के व्यापारी वर्ग की सहायता करेंगे। अतः न्यायसंगत होने के लिए बकाया रुपये की उन संविदाओं की मात्रा का सुविस्तृत अनुमान लगाया जाना चाहिए जो संविदाएं व्यापारी वर्ग तथा सरकार द्वारा निवेशकर्ता तथा कमाने वाले वर्गों द्वारा किया गया है और जिनको उनकी अवधि के अनुसार वर्गीकृत किया गया है तब यह पता चलेगा कि किसी निश्चित समय पर बकाया संविदाओं में वे संविदाएं शामिल होती हैं जो विगत 100 वर्ष के मूल्य”ास तथा मूल्य वृद्धि से पूर्व की किसी भी तथा प्रत्येक अवस्था में की गई है। उनमें से प्रत्येक के प्रति न्याय करने के लिए यह आवश्यक होगा कि रुपये के उस मूल्य के अनुसार विभिन्न मानों पर स्थिर किया जाए जो उस समय प्रचलित थे जब ये संविदाएं की गई थीं। परंतु अलग-अलग संविदाओं के लिए अलग मान रखना एक भौतिक असंभावना होगी। यदि इस समय विद्यमान सभी संविदाएं 1914 में की गई होतीं तो आदर्श न्याय के लिए यह हमें अपेक्षित होगा कि हम मुद्रा की युद्ध से पूर्व की सममूल्यता को पुनःस्थापित करें, यह ऐसी स्थिति द्वारा किया जाए जो मूल्यों के सामान्य स्तर को कम करके ठीक 1914 के स्तर तक ले आए। यदि इसके विपरीत यह पता चला कि इस समय विद्यमान समस्त संविदाएं, 1924 में की गई थीं, तब न्याय के लिए यह अपेक्षित होगा कि हमें 1924 का मूल्य स्तर बना कर रखना चाहिए। निःसंदेह, हम सबसे अच्छा