374 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
था कि रुपये के मूल्य में वृद्धि हो गई है। वास्तव में, यह परिस्थिति ही रुपये के मूल्य के कम होने का सबूत थी। यह अवमूल्यन चांदी के रूप में तथा सामान्यतः वस्तुओं के रूप में हुआ था। यदि 1920 में, चांदी की उतनी ही मात्रा खरीदने के लिए 1913 की अपेक्षा अधिक रुपयों की आवश्यकता थी तो इसका अभिप्राय यह था कि रुपये का मूल्य गिर गया था। समिति ने एक भारी गलती की, क्योंकि यह रुपये को मुद्रा के रूप में पृथक करने में असफल रही तथा चांदी की एक सिल्ली के रूप में रुपये से मूल्य का माप नहीं कर सकी। मूल्य का एक माप के रूप में रुपये का 2 शि. स्वर्ण विनिमय मूल्य कभी तथ्य नहीं था और इसलिए वर्तमान के समाधान में यदि हम उस सीमा को ध्यान में नहीं रखते तो यह पूर्णतया न्यायसंगत एवं उचित है। इसका एकमात्र औचित्य यदि इसे एक वैद्य औचित्य माना जा सके तो उसे 2 शि. स्वर्ण अनुपात कहा जा सकता है, जो इसमें शामिल है। जो लोग 1 शि. 4 पैं. अनुपात की मांग करते हैं, उनमें से कुछ ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनकी राय में इसका अभिप्राय युद्ध से पूर्व की स्थिति पर लौटना है। अब यदि यह युद्ध से पूर्व की स्थिति पर लौटना है तो वह वांछित है, तब सरकार यह कह सकती है कि 1924 में 1 शि. 4 पैं. मूल्य के रूप में माप वही नहीं है, जो 1914 में 1 शि. 4 पैं. मूल्य की थी। अनेक लोग इस बात को महसूस नहीं करते। परंतु यह एक अकाट्य तथ्य है। 1924 में तथा 1914 दोनों में ही विनिमय 1 शि. 4 पैं. था। परंतु भारत में बिक्री मूल्य का सूचकांक दिसम्बर, 1924 में 176 था जबकि जुलाई, 1914 में वह 100 था। अतएव, इसका अभिप्राय यह हुआ कि यदि हम युद्ध से पूर्व की स्थिति पर लौटना चाहते हैं तो रुपये का विनिमय मूल्य 1 शि. 4 पैं. रखकर काम नहीं चलेगा। क्योंकि युद्ध पूर्व की स्थिति पर लौटने का अर्थ है युद्ध-पूर्व मूल्य का होना। हमें अपने वर्तमान मूल्यों को 76 प्रतिशत घटाना चाहिए अर्थात रुपये का मूल्य 76 प्रतिशत बढ़ाना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि अंततोगत्वा, इसका अर्थ 2 शि. का अनुपात होता है। परंतु यह पूछा जा सकता है कि हमें युद्ध पूर्व की स्थिति पर क्यों लौटना चाहिए? वैसा करने की आवश्यकता नहीं है। यह याद रखना चाहिए कि पुरानी संविदाएं अब लागू नहीं हैं। उनसे से अधिकांश पूरे कर दिए गए हैं और उनको पूरा करने में जो भी गलती हो चुकी हैं, उसे अब ठीक नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि यद्यपि किसी निश्चित समय पर बकाया आर्थिक संविदाओं की अवधि अलग-अलग होती है कुछ एक दिन की, कुछ कई वर्षों की अवधि की, कुछ एक दशक अवधि की और यहां तक कि कुछ की अवधि एक शताब्दी की फिर भी अधिकांश बहुत हाल की तारीखों की गई हैं। क्योंकि ऐसी स्थिति थी, अतः हमें युद्ध से पहले प्रचलित स्तरों से नहीं बल्कि चालू व्यापार के स्तर से नवीन मानक के लिए अपना प्रारंभिक बिन्दु चुनना चाहिए इसे केवल इसलिए करना कि इससे हमें निम्न स्तर के मूल्य प्राप्त होंगे, अपने व्यापार तथा उद्योग को