भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या- 16th April 1925 - Page 390

भारतीय मुद्रा की वर्तमान समस्या

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विस्थापित करना है और इसका फल यह होगा कि सम्पन्नता खतरे में हो जाएगी। हमारे रुपये के वर्तमान मूल्य से ऊपर इसके मूल्य को 76 प्रतिशत तक बढ़ाने का अर्थ केवल यह नहीं है कि प्रत्येक व्यापारी तथा प्रत्येक निर्माता को उसके उत्पादन से 76 प्रतिशत कम प्राप्ति होगी, बल्कि इसका प्रभाव यह होगा कि उसे निवेशकर्ता वर्ग को 76 प्रतिशत देना पड़ेगा, जिससे उसने उधार लिया था और कमाने वाले वर्ग को देना होगा जिसको उसने काम में लगाया था। इस प्रकार, समाज के सक्रिय तथा श्रमिक वर्ग पर लादा गया भार असहनीय होगा। तथापि मुझे संभावित गलतफहमी से बचाव करना चाहिए। क्योंकि में निम्न मूल्य के विरुद्ध हूं अतः किसी को इस बात की कल्पना इसलिए नहीं करनी चाहिए मैं तो उच्चतर मूल्य के पक्ष में हूं। मैं इस बात पर बल देता हूं कि यदि एक बार वह मूल्य स्तर स्थापित हो जाए तो हमें उच्च मूल्य के प्रति शिकायत नहीं करनी चाहिए। क्योंकि एक बार वे जब स्वयं समायोजित हो जाती है तो वे चीजें हमारे सामान्य स्तर की हो जाती हैं। युद्ध पूर्व का स्तर असामान्य होगा और इसलिए उसे अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए।

इसलिए हमें 1 शि. 3 ख्7/8, पैं. तथा 1 शि. 6 पैं. के बीच छांट करनी चाहिए। चूंकि दोनों में से एक या दूसरे की छांट करने के लिए हमें जो बात न्यायसंगत तथा साफ है उसके द्वारा निर्देशित होना चाहिए। हम यह चाहते हैं कि उद्यम की संचय के विरुद्ध सहायता करनी चाहिए और संभवतः हम यह चाहते हैं कि धनी और अधिक धनी हो जाए। परंतु मेरा निश्चय है कि हममें से कोई यह नहीं चाहता कि संचित करने की प्रवृत्ति, जो पूंजी का आधार है, पर ध्यान न दिया जाए, या निर्धन व्यक्ति और निर्धन होता चला जाए। परंतु यह वास्तव में 1 शि. 6 पैं. की ओर झुकाव का परिणाम होगा। दूसरी ओर यद्यपि हम यह चाहते हैं कि पूंजी में वृद्धि हो और निर्धन व्यक्ति की स्थिति बेहतर हो फिर भी हममें से कोई भी यह नहीं चाहता कि उद्योग का अनादर किया जाए। फिर भी, ऐसा 1 शि. 6 पैं. तक अनुपात रखने का परिणाम होगा।

मैं स्वयं अनुपात के रूप में 1 शि. 6 पै. का चयन करूंगा जिस पर हमें, यदि हम ऐसा कर सकें निम्नलिखित कारणों से स्थिर करना चाहिएः

(1) इससे निवेश करने वाले एवं कमाई करने वाले वर्ग की स्थिति की रक्षा होगी_

(2) यह व्यापारी वर्ग पर कोई अतिरिक्त भार डालकर हमारे व्यापार तथा समृद्धि को दांव पर नहीं लगाएगी_ और

(3) बिल्कुल हाल की होने के कारण इससे यहां संभावना है कि यह आर्थिक संविदाओं की बहुत बड़ी संख्या को बड़ा न्याय करेगी। इनमें से अधिकांश संविदाएं हाल में की हुई होंगी।