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समीक्षा
मुद्रा तथा विनिमयऽ
भारतीय मुद्रा तथा विनिमय,
लेखक
एच.एल. चाबलानी, एम.ए. (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, बंबई) 1925 8 वाई 25
वाई 2 पृ. 184 रुपये 04-8-0
यह पुस्तिका निम्न स्तर का प्रकाशन है। लेखक ने एक जटिल विषय का जल्दी में कुछ विवेचन किया है, इस विषय को 180 पृष्ठों की एक छोटी सी परिधि में बांधा गया है। इसमें न तो पर्याप्त जानकारी है और न पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। कार्य पद्धति की सुस्पष्टता का अभाव है। परस्पर विरोधी कथनों, दुविधापूर्ण स्थिति के कारण लेखक की सही स्थिति समझना कठिन है। एक स्थान पर वह कहता है कि सोने का भारत में परिसंचरण इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि भारत एक निर्धन देश है। एक दूसरे स्थान पर वह कहता है कि भारत में सोने का परिसंचरण इसलिए नहीं है क्योंकि यहां रुपये हैं। रुपये के मात्रा-सिद्धांत-स्वयं में सबसे सरल तथा राजनीतिक अर्थनीति में सबसे स्पष्ट प्रस्ताव का विवेचन एक पूरे अध्याय में करने के बाद, वह कहता है कि 1893 के बाद रुपये का उत्थान कुल मिलाकर उसके निर्गम की सीमा के कारण नहीं था। इसी प्रकार के परस्पर विरोध कथन वाले विदेशी विनिमय संबंधी अध्याय में व्यक्त किए गए हैं। वहां पर वह दो सिद्धांतों यानी क्रय-शक्ति की समानता का सिद्धांत तथा व्यापार के संतुलन का सिद्धांत, में भेद करता है और वह पहले सिद्धांत के पक्ष में अपना निर्णय देते हुए इसे सच्चा सिद्धांत बताता है। फिर भी तमाम पुस्तक में वह एक गलत सिद्धांत यानी व्यापार का
ऽ दि सर्वेट ऑफ इंडिया, 25 जून 1925