378 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
संतुलन पर अपना तर्क देता है। फिर अपने आरंभ के अध्याय में वह कहता है कि रजत मानक पर वापस लौटने में कोई बेतुकी बात नहीं है। लेखक के निष्कर्ष के अनुसार मुद्रा का प्रबंध हमारी मुद्रा में सबसे बड़ा दोष है। फिर भी, इस दोष को दूर करने के एक उपाय के रूप में वह परिवर्तनीय रुपये की सिफारिश करता है।
दुविधापूर्ण स्थित वे इस तथ्य द्वारा प्रमाणित होती हैं कि वह भारतीय मुद्रा के पुनर्निर्माण के लिए किए गए प्रायः प्रत्येक प्रस्ताव से सहमत हैं। वह डॉ. फिशर की योजना, रजतमानक पर वापस लौटने में तथा एक विश्वजनीन स्वर्ण विनिमय मान में अच्छाई देखता है। फिर भी, लेखक की अपनी एक प्रिय योजना है और वह योजना है एक परिवर्तनीय रुपये का रखना, जो सोने के सिक्के में परिवर्तनीय नहीं, बल्कि केवल स्वर्ण बुलियन में परिवर्तनीय है। लेखक इस बात को प्रकट नहीं करता, बल्कि यह रिकार्डों द्वारा सुझाई गई योजना है जो उसने अपनी एक मितव्ययी तथा सुरक्षित मुद्रा के लिए प्रस्ताव में दी है। सौभाग्य से इसे इंग्लैंड के लिए नहीं अपनाया गया था। इसके कारण सरल थे। नोटों को कुछ निश्चित भार की स्वर्ण छड़ों में परिवर्तित किया जाएगा, इस कानून को बनाने का अभिप्राय यह था कि केवल वे लोग ही परिवर्तित कर सकें जिनके पास सोने की छड़ों की कीमत के नोट हों, शेष व्यक्ति परिवर्तन न कर सकें। दूसरे शब्दों में, यह महसूस किया गया कि ऐसी प्रणाली परिवर्तनीयता के प्रभाव को अत्यधिक कमजोर करेगी और इसके फलस्वरूप मुद्रास्फीति की शुरुआत होगी। अतएव, इस प्रस्ताव को पर्याप्त सुरक्षित नहीं माना गया। यह प्रस्ताव कम खर्चीला है या नहीं, इस विषय में उस समय कोई वादµविवाद नहीं हुआ, अतः उस पर यहां सुविधापूर्वक विचार किया जा सकता है। चूंकि भारत में अनेक लेखक हैंµऔर हमारा यह लेखक भी उनमें से एक है-जो स्वयं को सभ्य दिखाने के लिए, वे उसकी खिलाफ निन्दा करते हैं सोने की मुद्रा के रूप में प्रयोग करना बर्बरता है। मुद्रा के संबंध में लिखने वाले ये सभी सभ्य लेखक अपनी शक्ति स्वयं सिद्ध प्रतिज्ञप्ति को प्रदर्शित करने में खर्च करते हैं जबकि कोई भी विवाद नहीं करता कि कागज को विनिमय के माध्यम के रूप में प्रयोग करना, सोने को प्रयोग करने की अपेक्षा अधिक किफायती है। परंतु ये ही लेखक कभी भी इस बात को सिद्ध करने की चेष्टा नहीं करते कि ऐसी योजना किफायती होने के साथ-साथ मूल्यों की स्थिरता को सुनिश्चित करने के लिए भी सुरक्षित होगी। केवल एक ऐसी किफायती योजना से जो सुरक्षा की गारंटी नहीं देती कोई लाभ नहीं। स्वीकार करने योग्य योजना, किफायती तथा सुरक्षित दोनों ही होनी चाहिए। यदि वह मितव्ययी नहीं भी है तो भी चलेगी, परंतु यदि वह सुरक्षित नहीं है तो निश्चय ही नहीं चलेगी। अब मेरा यह निवेदन है कि यह