समीक्षा मुद्रा तथा विनिमय - Page 394

मुद्रा तथा विनिमय

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विचार कि एक मुद्रा के रूप में सोने को मूल्य के मान के रूप में किफायती बनाना, उसकी उपयोगिता को कम करना है, उतना ही स्वयं सिद्ध है जितना सभ्य लेखकों का यह विचार कि विनिमय के माध्यम के रूप में कागज का प्रयोग करना, सोने का प्रयोग करने की अपेक्षा अधिक किफायती है। मुद्रा के रूप में प्रयोग से सोने को निकाल देने का क्या अर्थ है? इसका सीधा-सा अर्थ यह है, कि सोने के प्रयोग को किफायती करके आप उसकी आपूर्ति को बढ़ाते हैं और उसकी आपूर्ति को बढ़ाकर आप उसके मूल्य को कम करते हैं अर्थात सोने के प्रयोग में यह मितव्ययता होने के कारण सोना एक ऐसी वस्तु हो जाती है और जिसके मूल्य में कमी हो गई है और इसलिए वह, उस सीमा तक मूल्य के मानक के रूप में कार्य करने के अयोग्स हो जाती है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कागज की मुद्रा का निर्गम या उस मामले में कोई और स्थानापन्न वस्तु, धात्वीय मुद्रा के लिए मांग को प्रभावित करती है। इसमें संदेह नहीं है कि जो लोग यह संशय रखते हैं कि धात्वीय मुद्रा की मांग कागज निर्गम द्वारा प्रभावित होगी कि नहीं जिस प्रकार मुद्रा की परिवर्तनीयता या अपरिवर्तनीयता है। परन्तु यह एक गलती है। इसकी जांच यह है क्या कागज का निर्गम धात्वीय रिजर्व द्वारा आवृत्त है या अनावृत्त है परंतु यदि वे आवृत्त नहीं हैं तब वे धात्वीय मुद्रा की मांग को प्रभावित करेगी चाहे वे परिवर्तनीय हों या अपरिवर्तनीय हों। व्याख्या यह है कि आवृत्त नोट केवल धात्वीय मुद्रा को प्रतिबंधित करते हैं, परंतु अनावृत्त नोट कीमती भंडार में वृद्धि करते हैं। अतएव आप सोने को किफायती बनाने तथा उसके मानक के रूप में भी प्रयोग करने के दोनों कार्य नहीं कर सकते। यदि आप सोने को किफायती बनाना चाहते हैं तो आपको चाहिए कि आप सोने को मूल्य के एक मानक के रूप में बनने से रोकें। इसके अलावा, वर्तमान समय में, सोने को किफायती बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि समस्त संसार में रुपये का इतना भारी आधिक्य है कि हम सोने को जितना कम किफायती बनाएं उतना ही बेहतर है। इस दृष्टि से स्वर्ण विनिमय मान जो एक समय वरदान था, अब अभिशाप हो गया है। कुछ समय तक इसने बहुत ही उपयोगी कार्य किया। 1873 से सोने के उत्पादन में गिरावट आई थी और स्वर्ण विनिमय मान द्वारा प्रभावित मितव्यता का वास्तव में बहुत स्वागत किया गया था, क्योंकि इसने संकुचन की अवधि में, विश्व के देशों के रुपये का प्रसार करने में सहायता की और उससे उसने अंतर्राष्ट्रीय मूल्य प्रणाली की स्थिरता को बनाए रखने में सहायता मिली। यह कार्य उसने मूल्यों में तेजी से गिरावट को रोकने के लिए किया। यदि स्वर्णमान को स्थापित करने वाले समस्त देश भी सोने को मुद्रा के रूप में अपना लेते तो मूल्यों में गिरावट अपरिहार्य थी। परंतु