समीक्षा मुद्रा तथा विनिमय - Page 395

380 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

1910 के बाद, स्थिति में परिवर्तन हुआ और सोने के उत्पादन में वृद्धि हुई, इसका परिणाम यह हुआ कि उसके बाद स्वर्ण विनिमय मान के निरंतर बने रहने से मूल्यों की वृद्धि को रोक कर देशों की सहायता नहीं की बल्कि वास्तव में उनको बढ़ाकर उनकी सहायता की जो सोने के प्रयोग में मितव्ययता के कारण, पहले से अधिक उत्पन्न सोना फालतू हो गया। लेखक समर्थन के रूप में प्रो. फिशर तथा अन्य विद्वानों को उद्धृत करता है जो 1911 के बाद मूल्यों की वृद्धि के लिए स्वर्णमान को दोष देते हैं। परंतु प्रो. फिशर इस तथ्य की ओर ध्यान नहीं देते कि स्वर्ण विनिमय मान के अन्यत्र जारी रहने के कारण सोना मूल्य का एक खराब मानक हो गया था। क्योंकि यदि 1911 के बाद, स्वर्ण विनिमय मान को समाप्त कर दिया जाता और देश सोने की किफायत करने के बजाय उसका प्रयोग करते, तो सोने का कोई बाहुल्य न होता और इसके फलस्वरूप, मूल्यों में वृद्धि को रोक दिया जाता। इस दृष्टि से स्वर्ण विनिमय मान अपने लक्ष्य से भी अधिक समय तक बना रहा है और अब वह सकारात्मक हानि पहुंचा रहा है। इन तर्को के परिप्रेक्ष्य में उन परियोजनाओं के साथ सहानुभूति होना संभव नहीं है जो सोने के प्रयोग में किफायत करते हैं और फिर भी इसे मूल्य के एक मानक के रूप में बनाए रखते हैं।

ये बातें लेखक की निगाह से उस समय बिल्कुल बच गई हैं जब रुपये की अपनी परियोजना को उसने स्वर्ण बुलियन में परिवर्तनीय का विचार किया। परंतु स्वर्ण की छड़ों में परवर्तनीयता में लेखक की समूची योजना सम्मिलित नहीं होती। परिवर्तनीयता के साथ-साथ वह कहता है कि रुपयों तथा छोटे नोटों के निर्गम पर एक सीमा व प्रतिबंध रखा जाना चाहिए और यह सीमा तक की रहनी चाहिए जब ये स्वर्ण बुलियन में कानूनी तौर पर प्रिवर्तनीय हों। भारत में मुद्रा के प्रतिवर्ष केवल बहुत कम प्रतिशत में प्रसार करने की अनुमति होनी चाहिए जो व्यापार में प्रगति की सामान्य दर को प्रस्तुत करे। उस प्रतिशत से अधिक मुद्रा को बढ़ाने की शक्ति सरकार के पास नहीं होनी चाहिए। रुपये तथा छोटे नोटों के निर्गम पर इस उतार-चढ़ाव की सीमा के लिए कारण बताते समय लेखक कहता है, ‘‘एक परिवर्तनीय रुपया, अपने मूल्य वर्ग में चूंकि छोटा होता है, अतः वह मुद्रास्फीति के प्रति पर्याप्त सुरक्षा नहीं है। चूंकि जैसा कि पुराने अर्थशास्त्रियों ने स्पष्ट रूप में यह दर्शाया है, छोटे नोटों की वास्तविक आस्थगित परिवर्तनीयता, उसे व्यावहारिक रूप में अपरिवर्तनीय बना देती है और उसके अधिक निर्गम की ठीक उतनी ही संभावना होती है जितनी संभावना अपरिवर्तनीय कागज की होती है।’’ यदि यह सब