मुद्रा तथा विनिमय
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आश्चर्यजनक नहीं तो विलक्षण है। यह आश्चर्यजनक इसलिए है क्योंकि एक स्थान पर लेखक कहता है, ‘‘परिवर्तनीयता मुद्रा की प्रचुरता के लिए सर्वोत्तम सुरक्षित उपाय है। यह मुद्रा में स्फीति करने वाली सरकार को सबसे आसान स्वयं चालित
खतरे का संकेत प्रदान करता है।’’ अब, यदि ऐसा है तो परिवर्तनीय रुपया, उस उद्देश्य के लिए पर्याप्त क्यों नहीं, जो लेखक की दृष्टि में है? लेखक का यह कहना गलत है कि पुराने अर्थशास्त्रियों का यह विश्वास था कि छोटे नोटों की परिवर्तनीयता, अति निर्गम के विरुद्ध पर्याप्त सुरक्षा नहीं है। पुराने अर्थशास्त्रियों को यह डर नहीं था कि परिवर्तनीयता, सोने की उस स्थिति में परिसंचरण में बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थी, यदि बैंकों को छोटे मूल्य वर्ग के नोट जारी करने की अनुमति दे दी जाती है। यह विचार पुराने अर्थशास्त्रियों के विचार से बिल्कुल भिन्न है। फिर, उनके लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, पुराने अर्थशास्त्रियों ने उनके निर्गम पर कोई प्रतिबंध लगाने के लिए आग्रह नहीं किया था जैसा कि हमारे इस लेखक ने बताया है कि उन्होंने वैसा किया था। उन्होंने छोटे मूल्य वर्ग का पूर्ण निषेध करने के लिए आग्रह किया था। यही कारण है कि हमें यह पता चलता है कि बैंक ऑफ इंग्लैंड को चार्टर एक्ट द्वारा 5 पाउंड से कम मूल्यवर्ग के नोट जारी करने से रोक दिया गया था। इसके समनुरूप होने के लिए, लेखक को यह सिफारिश करनी चाहिए थी कि भारत सरकार को पांच रुपये मूल्यवर्ग से कम के रुपये या चांदी के नोट जारी नहीं करने चाहिए। इसके स्थान पर, वह एक ऊलजलूल, तथा अव्यवहार्य योजना की सिफारिश करता है। मान लिया, इस प्रतिशत को निर्धारित करना संभव होता लेखक ने हमें नहीं बताया कि यह कैसे होगा तो क्या उस प्रतिशत को हमेशा बनाए रखना होगा? या यह पर्याप्त होगा, कि यदि प्रत्येक वित्त वर्ष के अंत में यह पाया जाए कि प्रतिशत उससे आगे नहीं बढ़ी है? यदि दूसरी बात, यही सब योजना की मांग है, तब उस मुद्रा की मात्रा की वृद्धि या ह्रास पर कोई प्रतिबंध नहीं हो सकता जो मुद्रा वर्ष के दौरान जारी की जा सके बशर्ते कि इस बात का ध्यान रखा जाए कि वर्ष के अंत में शेष जो कि सामान्य से अधिक निश्चित प्रतिशत के बराबर है वृद्धि की ओर अग्रसर है। फिर क्या सामान्य एक ऐसी संख्या हो जो हमेशा के लिए निर्धारित कर दी जाए या वह एक ऐसी संख्या हो जिसे संशोधित किया जा सके? यदि वह संशोधन करने के योग्य है तो इसमें संशोधन किस प्रकार किया जाए और उस सामान्य संख्या में संशोधन कौन प्राधिकारी कर सकता है? इस योजना को स्वीकार करने से पहले, ये कुछ प्रश्न हैं जिनका उत्तर देना होगा। परंतु इस बात पर आश्चर्य होता है कि ऐसी प्रवीणता में रत होने के बजाए क्या यह