384 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की जांच करें जिससे कराधान के भार को इस समय जनसंख्या के विभिन्न वर्गों के बीच विभाजित किया गया है_ (2) इस बात पर विचार करें कि क्या कराधान की समूची योजना न्यायसंगत तथा आर्थिक सिद्धांतों के अनुरूप है, और यदि नहीं है तो उसमें किस प्रकार की कमी है_ और (3) यह कराधान के वैकल्पिक स्रोतों की उपयुक्तता के संबंध में रिपोर्ट दे। अपनी रिपोर्ट को तैयार करते समय समिति ने इन तीन प्रश्नों को ध्यान में रखकर इनको समुचित स्थान प्रदान करने में बहुत न्यायपूर्ण कार्य नहीं किया है। समिति को सौंपे गए समूचे दायित्व में इन तीनों प्रश्नों में से प्रथम प्रश्न स्पष्टतया सबसे महत्त्वपूर्ण था। फिर भी, 447 पृष्ठों की पुस्तक में इस प्रश्न पर विचार की सामग्री केवल 13 पृष्ठों में दी गई है। इसके अलावा, इस विषय पर चर्चा भी संतोषजनक नहीं की गई है। समिति ने कोई भी कारण बताए बिना देश की जनसंख्या को 11 वर्गों में विभक्त किया है और उनके द्वारा वहन किए जाने वाले भार पर साढ़े दस पृष्ठों में चर्चा की गई है। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न अर्थात् भारतीय वित्तीय प्रणाली के अधीन थोपे गए व्यक्तिगत करों की घटनाओं को छुआ नहीं गया। अब कोई भी व्यक्ति यह भी जानकारी प्राप्त करना चाहेगा समिति ने क्योंकि यह 11 वर्गों में वर्गीकरण की दृष्टि से विस्तारपूर्ण क्यों मान लिया। यदि वर्गीकरण करने का ही प्रश्न था तो यह 13 वर्गों में क्यों नहीं किया? फिर समिति पूर्णतया कैसे कह सकती है कि एक व्यापारी करों का कितना भार वहन करता है यदि वे व्यक्तिगत करों के प्रभाव की जांच कर लेते तो शायद उन्हें यह पता चलता कि वह उनमें से किसी प्रकार के भार का वहन नहीं करता था। फिर एक दूसरा विशेष उदाहरण लीजिए, यह उदाहरण कपास उत्पादन शुल्क का है। समिति को इस बात को कहने में कोई कठिनाई नहीं है कि इसके उन्मूलन से श्रमिक वर्ग को लाभ होगा। परन्तु क्या समिति को इस बात का बिल्कुल निश्चय है कि इसे उपभोक्ता पर हस्तांतरित कर दिया गया था? मैं समिति के प्रति अन्यायपूर्ण बिल्कुल होना नहीं चाहता। परन्तु मैं यह बात कहने के लिए बाध्य हूं कि इस संबंध में समिति की रिपोर्ट सबसे निराशाजनक दस्तावेज है। समिति ने भारत में कराधान के विभिन्न स्रोतों के विस्तृत इतिहास को इस पुस्तक में बहुत अधिक स्थान प्रदान किया है। इसलिए, यह बहुत अच्छा है। परन्तु यदि समिति प्रत्येक कर के अलग-अलग विवरण के विवेचन को आधा स्थान प्रदान कर देती तो यह उससे भी अधिक बेहतर बात होती, परन्तु समिति ने ऐसा करना बिल्कुल छोड़ दिया। यदि वैसा कर दिया जाता तो समिति करों के भार के वितरण, तथा अन्यायपूर्ण करों को समाप्त करने के प्रश्न पर विचार करने की बेहतर स्थिति में होती। इस समिति से जो आशा की गई थी वह उसके अनुसार कार्य करने में असमर्थ रही। इस समिति पर देश का साढ़े चार लाख रुपया खर्च हुआ। यह खर्च मुद्रण के अतिरिक्त है।