दोहरे मानक से रजत मानक तक
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थी। शासकीय विचार के अनुसार 165 ग्रेन का चयन करना था जैसाकि शुद्धता का स्तर था और यह स्थिति मानक भार के चयन करने में भी रही ताकि वर्तमान प्रबंध में यथासंभव कुछ भी बाधा न हो। शुद्धता का यह मानक चांदी के उन सिक्कों से नितांत भिन्न नहीं था जिन्हें भारत की विभिन्न सरकारों ने अपनी मुद्रा की मुख्य इकाइयों के रूप में मान्यता प्रदान की थी। इसके विवरण आगे दिए गए तुलनात्मक विवरण पत्र में दिए गए हैं।
तालिका- II
मुख्य मान्यता प्राप्त रुपये से भिन्न शुद्धता के प्रस्तावित मानक का अपसरण
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Col5 | izLrkfor #i;s dh rqyuk esa de ewY;kadu |
Col7 |
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| lwjr #i;k vkdksZV #i;k** flDdk #i;k iQ#[kkckn #Ik;k ** cukjl #i;k |
164-74 166-477 175-927 166-135 169-251 |
165 165 165 165 165** ** |
& 1-477 10-927 1-135 4-251 |
& -887 8-211 -683 2-2511 |
-26 & & & &** ** |
-157 & & & & |
इस प्रकार यह देखा जाएगा कि सिक्का और बनारस के रुपये के सिवाय शुद्धता का प्रस्तावित मानक अन्य रुपयों से इतना अधिक मिलता-जुलता था कि पर्याप्त विस्थापन के बिना पूर्ण एकरूपता के प्राप्त करने की रुचि ने उसके अंगीकरण की सभी संभव आपत्तियों को अस्वीकार कर दिया। एक दूसरा विचार शुद्धता के मानक के रूप में 165 ग्रेन के चयन में निदेशकों के अधिकरण में छाया रहा, वह यह था कि मानक भार के रूप में 180 ग्रेन के साथ मिलकर ऐसी व्यवस्था की गई कि रुपये को 11/12 शुद्ध बनाया गया। विशेष प्रकार की शुद्धता को निश्चित करने की बात निदेशकों के अधिकरण के लिए अत्यन्त तकनीकी बात थी। परंतु 1803 में नियुक्त टकसाल और सिक्कों के ढालने के लिए ब्रिटिश समिति की राय थी कि ‘‘1/12 मिश्रित धातु और 11/12 शुद्ध धातु अधिक महंगे प्रयोग होते हुए भी सर्वोत्तम अनुपात सिद्ध हुए अथवा कम से कम इतने अच्छे थे जिनका चयन किया जा सकता था।’’ इस मानक को इतना अधिक अधिकारपूर्वक ढंग से स्वीकार किया गया कि अधिकरण ने अपनी भारतीय मुद्रा की नवीन योजना में उसे सम्मिलित कर लिया। इसलिए उन्होंने यह इच्छा व्यक्त की कि रुपये को 11/12 शुद्ध रखा जाए। परंतु ऐसा करने के लिए रुपये में 165 ग्रेन की शुद्धता बनाईं रखनी थी और उपरोक्त