1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 41

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कारखानों से उन्होंने रुपये में ऐसी शुद्धता रखने की इच्छा व्यक्त कीऽ भावी घटनाओं के लाभप्रद आधार से एकाकी धातु के लिए निदेशकों के अधिकरण की वरीयता की समीक्षा करते हुए कोई भी व्यक्ति इसे अदूरदर्शी दृष्टि मानने की सोच सकता है। फिर भी ऐसा समय में इस पक्ष में निर्णय के लिए समुचित आधार था। इस संबंध में प्रथम कार्यवाही के रूप में तीनों महाप्रान्तों ने जिन्हें दृष्टि से महाप्रान्तों में विभाजित किया गया था प्रान्त में सरकार स्थापित होते ही इसे अंगीकार कर लिया तथा मुगलों के समानांतर मानक को मोहर, पैगोड़ा और रुपए के बीच विनिमय के वैध अनुपात की स्थापना द्वारा दोहरे मानक में परिवर्तित किया गया परंतु किसी भी महाप्रांत में इस प्रयोग को पूरी सफलता प्राप्त नहीं हुई।

बंगाल [†] में सरकार ने 2 जून, 1766 को 179.66 ग्रेन ट्राय के भार के सोने की मोहरें जारी करने का निश्चय किया और इस मोहर में 149.92 ग्रेन ट्राय शुद्ध धातु थी और इसे रुपये के 14 सिक्के के मूल्य का वैध सिक्का माना गया ताकि खजानों में राजस्व-वसूलियों को अवरुद्ध करने के अपने ही कार्य से अधिकांशतया उत्पन्न मुद्रा-अभाव की पूर्ति हो सके जो वाणिज्य के लिए प्रतिकूल था। यह 16.45ः1 का वैध अनुपात था और यह 14.81ः1 के बाजार के अनुपात से नितांत भिन्न था। इन दोनों सिक्कों के साथ-साथ परिचालन को सुरक्षित रखने का प्रयास असफल सिद्ध हुआ। चीन, मद्रास और बंबई को बंगाल की चांदी की निकासी के कारण मुद्रा की स्थिति खराब हो गई। इतना ही नहीं सरकार ने 20 मार्च, 1769 को एक दूसरी सोने की मोहर जारी की जिसका भार 190.773 ग्रेन ट्रान था और जिसमें 190.086 ग्रेन शुद्ध सोना था जिसका मूल्य रुपये के 16 सिक्के के बराबर निर्धारित किया गया। यह 14ः81ः1 का वैध अनुपात था और यह अनुपात भारत (14ः1) और यूरोप (14ः61ः1) दोनों के बाजार-अनुपात से अधिक था। यह दूसरा प्रयास था कि दोनों ही सिक्कों का एक साथ परिचालन किया जाए परंतु यह पहले प्रयोग के समान ही सफल नहीं हो सका। सही अनुपात लगाने का कार्य इतना उलझन भरा लगने लगा कि सरकार ने 3 दिसम्बर, 1788 को सोने के सिक्के की ढलाई बंद करके एक धातु के सिक्के ढालने का काम फिर से प्रारंभ कर दिया और जब मुद्रा अभाव का फिर दबाव हुआ तो सरकार ने विवश होकर सोने के सिक्के को ढालने का काम फिर शुरू किया। सरकार ने इस बात को वरीयता दी कि मोहर और रुपये को बाजार के मूल्य पर परिचालित किया जाए और इस हेतु किसी भी निर्धारित अनुपात द्वारा उनमें

ऽ देखिए दि डिस्पैच, सामने के पृष्ठ का उद्धृत पैरा-9

† एफ.सी.हैरीसन, सोने के संबध में भारत सरकार अतीत कार्य इकोनॉमिक जर्नल खंड- III पृ. 54 बंगाल

पब्लिक कंस्लटेशन, दिनांक 29 सितम्बर, 1796 को जान शोर द्वारा दिया गया विवरण।