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दोहरे मानक से रजत मानक तक

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सह संबंध स्थापित करने का प्रयास नहीं किया। 1793 में तीसरा प्रयास किया गया बंगाल में दोहरा मानक स्थापित किया जाए। उस वर्ष एक नयी मोहर जारी की गई। जिसका मान 190.895 ग्रेन ट्राय था और 189.4037 ग्रेन शुद्ध सोना था और इसे रुपये के 6 सिक्कों के बराबर मूल्य का वैध सिक्का माना गया। इसका अनुपात 14.86ः1 था परंतु यह अनुपात उस बाजार में विद्यमान अनुपात के समान नहीं था। अतः बंगाल के द्विधातु के सिक्के स्थापित करने का तीसरा प्रयास भी ठीक उसी तरह असफल हो गया जैसा कि 1766 और 1769 में असफल प्रयास किया गया था।

इसी प्रकार मद्रास सरकारऽ के प्रयास बंगाल सरकार के प्रयासों से कहीं अधिक असफल सिद्ध हुए। उस महाप्रांत में ब्रिटिश सरकार के अधीन द्विधातु के सिक्के ढालने का प्रथम प्रयास वर्ष 1749 में किया गया था जब 350 आर्कोट रुपये 100 स्टार पैगोडा के समान वैध माने गए थे। उस समय प्रचलित बाजार भाव के अनुपात की तुलना में इस अनुपात में पैगोडा की कीमत कम आंकी गई और यह पैगोडा महाप्रांत का सोने का सिक्का था। पैगोडा के विलुप्त हो जाने के कारण मुद्रा की बहुत कमी हो गई और सरकार दिसम्बर, 1750 में फिर से इस मुद्रा को पुनर्जीवित करने पर बाध्य हो गई। यह कार्य दोहरी योजना के अपनाने से सम्पन्न किया गया। एक ओर सरकार के खाते में सोने का आयात किया गया जिससे टकसाल के अनुपात को बाजार के अनुपात के बराबर लाया जाए और दूसरी ओर सरकारी खजानों में केवल पैगोडा द्वारा ही प्राप्तियां और भुगतान करने पर मजबूर किया गया।

दूसरी युक्ति बहुत छोटे मूल्य की रही परंतु पहली स्थिति अपनी विशाल मात्रा के कारण स्थिति को सुधारने में अधिक फलदायक सिद्ध हुई। दुर्भाग्यवश यह मामला बिल्कुल अस्थायी था। 1756 और 1771 के बीच की अवधि में रुपये और पैगोडा के बराबर भाव के अनुपात में काफी परिवर्तन हुआ। 1956 में यह अनुपात 364ः100 था और 1768 में यह अनुपात 370ः100 रहा। 1768 के बाद भी ऐसा नहीं था कि 1749 में निर्धारित वैध अनुपात के समान बाजार भाव के अनुपात रहे और यह स्थिति 12 वर्ष तक स्थिर बनी रही परंतु चांदी के आयात में वृद्धि होने के कारण द्वितीय मैसूर युद्ध को आगे बढ़ाना आवश्यक समझा गया जिसके फलस्वरूप इस अनुपात में व्यवधान पड़ गया और यह अनुपात युद्ध की समाप्ति के बाद 400 अर्कोट रुपए 100 स्टार पैगोडा रह गया। युद्ध की समाप्ति के बाद मद्रास की सरकार ने एक अन्य

ऽ इंडियन जर्नल ऑफ इकोनोमिक्स जनवरी, 1921 ने प्रकाशित एच. डौडवैल का लेख ‘‘सबस्टीट्टूशन ऑफ

सिलवर फॉर गोल्ड इन साउथ इंडिया (दक्षिण भारत के सोने के स्थान पर चांदी का स्थानापन्न।