दोहरे मानक से रजत मानक तक
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बाहर ही नहीं कर दिए गए अपितु मोहर भी प्रिचालन से अलग हो गई क्योंकि सूरत के रुपयों की खोट मिलावट के बाद यह अनुपात सोने के लिए भी अहितकर हो गया और सफल द्विधातु पद्धति का एक अन्य अवसर खो गया। एक बार फिर मोहर और रुपये के बीच द्विधातु के अनुपात निर्धारण का प्रश्न उठा जब बंबई की सरकार ने सूरत के रुपयों को अपनी ही टकसाल में ढालने की अनुमति प्रदान की। 1744 के विनिमय के अनुसार सोने की मोहर ढालने के काम का प्रश्न ही नहीं उठता। बम्बई की मोहर में शुद्ध सोने का अंश 177.38 ग्रेन था और 1800 के मानक के 15 सूरत रुपयों में चांदी का अंश 247.11 ग्रेन रहा। इसे विनिमय के अनुसार चांदी सोने का अनुपात 247.11/177.38 अर्थात् 13.9ः1 हुआ। इस स्थिति में मोहर को मूल्य बहुत कम आंका गया अतः यह संकल्प किया गया कि सूरत रुपये की तुलना में मोहर के मानक में परिवर्तन कर दिया जाए और इस प्रकार यह अनुपात 14.9ः1 रहा लेकिन बाजार का अनुपात 15.5ः1 रहा अतः यह प्रयोग बिल्कुल ही सफल न हो गया।
इस अनुभव के प्रकाश में ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों के अधिकरण ने भारत में भावी मुद्रा पद्धति के आधार के रूप में एकल धातु मानक निर्धारित किया। सभी मुद्रा विषयक विनिमयों का मुख्य उद्धेश्य है कि मुद्रा की अलग-अलग इकाइयों में पारस्परिक मूल्य का स्थिर संबंध होना चाहिए। मूल्य में स्थाई निर्धारण के बिना मुद्रा की स्थिति अस्त-व्यस्त हो जाएगी और उस निर्धारण की अस्थायी अस्त-व्यस्तता के लिए कोई भी पूर्वोपाय विशेष लाभप्रद न होगा। मुद्रा के विभिन्न भागों के मध्य स्थिरता सुनियोजित मुद्रा पद्धति इतनी आवश्यक है कि हमें यह जानकर आश्चर्य नहीं है कि निदेशकों के अधिकरण ने इस पर अधिक महत्व दिया जैसा कि उन्होंने किया जबकि विशेष रूप से मुद्रा का ठोस और स्थायी आधार पर बनाए रखने के कार्य में लगे थे। यह भी नहीं कहा जा सकता कि उनका एकल धातु का चयन गलत सलाह के कारण था क्योंकि यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि दोहरे मानक की तुलना में इस प्रकार का एकल मानक इस स्थिरता को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा प्रदान करता है। पहले प्रकार में यह स्वतः उत्पन्न होता है जबकि दूसरे प्रकार में यह विवश होकर करना पड़ता है।
निदेशकों के अधिकरण की इन सिफारिशों को भारत की विभिन्न सरकारों पर छोड़ दिया गया ताकि वे अपने विवेक के अनुसार इनको कार्यान्वित करें जहां तक समय और कार्यविधि का संबंध हैं इन आदेशों के समरूप कदम उठाने और यहां तक कि अधिकरण के कार्यक्रम के उन भागों को पूरा कर लेने पर कुछ समय लगा जिनका संबंध एक सी मुद्रा की स्थापना से था कि विभिन्न सरकारों के प्रयत्नों पर सबसे पहले ध्यान केन्द्रित किया गया।