दोहरे मानक से रजत मानक तक
तालिका- III
सन् 1833 की समाप्ति होने तक सिक्का निर्माण की एकरूपता
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204-710 & 180 180 |
187-651 & 165 vFkok 11@12 165 vFkok 11@12 |
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1833 की समाप्ति तक जैसी स्थिति थी उसका अनुमान करते हुए हमें यह लगता है कि बंगाल में सिक्का रुपया और सोने की मोहर के सिवाय निदेशकों की योजना का वह भाग प्राप्त कर लिया गया था जिसका संबंध सिक्का ढालने की एकरूपता से था। इसको पूर्ण करने की दिशा में कुछ नहीं बचा था। केवल सिक्का रुपये को हटा देना था और सोने का विमुद्रीकरण किया जाना था। इस अवसर पर अधिकरण के निदेशकों के और तीन भारत सरकारों के बीच विरोध उत्पन्न हो गया। सोने के विमुद्रीकरण करने में काफी अनिच्छा प्रकट की गई। मद्रास की सरकार जिसने अधिकरण की योजना के अनुसार अपनी मुद्रा में सुधार कार्य को सर्वप्रथम हाथ में लिया रुपये के ढालने के साथ-साथ सोने के सिक्के ढालना जारी रखने पर जोर ही नहीं दियाऽ अपितु अपने क्षेत्र
ऽ निदेशकों के अधिकरण ने रुपये से अलग हटकर सोने के सिक्के ढालने तथा उनके परिचालन की
अनुमति देने में सहमति व्यक्त की क्योंकि उन्होंने अपने राजकीय कागजात में यह कहा थाः-
‘‘16 यद्यपि हम इस औचित्य से पूर्णतया संतुष्ट हैं कि चांदी के रुपये को मूल्य और लेखे की मुद्रा
का मुख्य साधन माना जाए। फिर भी हम किसी भी प्रकार इस बात के इच्छुक नहीं हैं कि सोने के
सिक्के के परिचालन पर रोक लगा दी जाए अपितु हम सामान्य उपयोग के लिए उपयुक्त सिद्धांत के
आधार पर सोने के सिक्कों को स्थापित करना चाहते हैं। हमारे मत के अनुसार इस सिक्के को सोने
का रुपया कहना चाहिए तथा उसे उसी स्तर का ढालना चाहिए जैसा कि चांदी का रुपया ढाला जाता
है।’’ बंगाल रेग्यूलेशन 11, 1819 ।