1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 47

32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में प्रचलित स्थायी अनुपात में दोहरी वैध मुद्रा की पद्धति से अलग हटने के लिए जोरदार शब्दों में इनकार कर दिया।ऽ चाहे अधिकरण द्वारा बारंबार प्रतिवाद किया गया हो। [†] बंगाल की सरकार ने दृढ़ता के साथ द्विधातु के मानकऽ का साथ दिया। बिना अधिकरण की इस संबंध में बार-बार चेतावनी की परवाह किए बंगाल की सरकार भी द्विधातु मानक को जोर से पकड़े रही। सोने की मोहर को विभ्रमित [‡] न कर उसने मानक को ही बदलना शुरू कर दिया। [‡‡] शुद्ध अंतर्वस्तु 189.4037 से घटकर 187 . 651 ट्राय ग्रेन कर दिया गया ताकि 1818 में मद्रास में अपनाए गए अनुपात के आधार पर द्विधातु पद्धति को पुनः स्थापित किया जाए। द्विधातु मानक के साथ उसका इतना अधिक चिपकाव था कि 1833 [§] में इसने सिक्का रुपये के भार और शुद्धता को क्रमशः 196 ग्रेन ट्राय तथा 176 ग्रेन (शुद्धता) में परिवर्तित कर दिया। इसका शायद कारण यह हो कि मोहर और रुपये में वैध और बाजार भाव अनुपात के बीच संभावित अंतर को ठीक करना था। [§§] दूसरी ओर भारत सरकार अधिकरण की इच्छा से और अधिक आगे बढ़ना चाहती थी। अधिकरण के विचार से (अर्थात् ऐसी मुद्रा जिसका निर्माण समान किन्तु स्वतंत्र इकाइयों द्वारा किया गया था) सब कुछ था जिसकी भारत को आवश्यकता थी। वास्तव में उन्होंने सरकारों को समझाया कि उनकी यह इच्छा नहीं थी कि ‘‘मुद्रा के सरलीकरण के मामले में कुछ अधिक कार्य किया जाए और वे पूर्ण रूप से इस बात के इच्छुक थे कि सिक्का और मोहर का उसी प्रकार आत्मसात् किए बिना रहने दिया जाए।’’ [@] निस्संदेह एक रूप मुद्रा का परिचालन उस व्यवस्था में जो मुगलों के उत्तराधिकारियों ने छोड़ी थी एक अग्रणी कदम था। परंतु यह पर्याप्त नहीं था और परिस्थिति की आवश्यकता के अनुसार आम मुद्रा की मांग थी जिसका आधार एकरूप मुद्रा के स्थान पर एकल इकाई था। एक रूप मुद्रा पद्धति के अंतर्गत प्रत्येक महाप्रांत ने अपनी ही मुद्रा में सिक्के ढाले और अन्य महाप्रान्तों की टकसालों में ढाले गए सिक्के टकसाल के सिवाय

ऽ देखिए 19 अगस्त 1817 का फोर्ट सेंट जेम्स पब्लिक कंसलटेशन्स विशेषतया महालेखाकार का पत्र। † देखिए 6 मार्च 1810, 10 जुलाई 1811 और 12 जून 1816 को मद्रास के लिए सार्वजनिक कागजात

(पब्लिक डिस्पैच)।

‡ प्रिएम्बल टू दि बंगाल रेग्यूलेशन, XIV, 1818

‡‡ फिर भी, इतने में 190.895 से बढ़ाकर 204.710 ट्राय ग्रेन की वृद्धि कर दी ।

§ बंगाल रेग्यूलेशन, VII, 1833

§§ यह हो सकता है कि इस परिवर्तन का मंतव्य यह था कि सिक्का रुपये की 11/12 की शुद्धता से ढाला

जाए।

@ देखिए, डिस्पैच टू बंगाल, तारीख 11 मार्च, 1829