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दोहरे मानक से रजत मानक तक

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अपने क्षेत्र में वैध मुद्रा नहीं माने गए। मुद्रा की स्वतंत्रता अधिक हानिप्रद नहीं होगी यदि तीनों महाप्रांतों के बीच वित्तीय स्वतंत्रता भी बनी है। वास्तव में यद्यपि प्रत्येक महाप्रान्त में अपनी ही वित्तीय पद्धति थी तथापि वे अपने ही घाटों के वित्त के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहे। उनके बीच ‘‘आपूर्ति’’ की नियमित पद्धति थी और एक महाप्रांत के अधिशेष की पूर्ति बराबर दूसरे महाप्रान्त के आहरण से की जाती थी ताकि अन्य क्षेत्रों में घाटे की राशियों की पूर्ति की जाए। एक आम मुद्रा के अभाव में इस संसाधन क्रिया में काफी बाधा आई। ‘‘आपूर्ति’’ क्रिया के मार्ग में आम मुद्रा के अभाव द्वारा उत्पन्न कठिनाइयों में स्वयं दो अलग-अलग तारीकों में अनुभव कराया गया। अन्य महाप्रांतों की मुद्रा को वैध मुद्रा के रूप में उपयोग न करने के कारण प्रत्येक महाप्रांत को वाणिज्य के घाटे तथा आत्मनिर्भर होने के लिए अधिक कार्यशील शेषों को बंद करना पड़ा।ऽ अधिक शेष की आवश्यकता को आरोपित करने वाली पद्धति ने अन्य महाप्रान्तों की कम प्रभावोत्पादक राहत उत्पन्न की क्योंकि यह आपूर्ति उस महाप्रान्त की मुद्रा का रूप थी जिसने उसकी स्वीकृति दी थी और इससे पूर्व कि उसका उपयोग हो पाता, जरूरतमंद महाप्रांत की मुद्रा को फिर से सिक्कों में ढालना पड़ता। फिर से सिक्कों के ढालने से न केवल हानि हुई अपितु इस पद्धति से स्पष्टतया सौदागरों को असुविधा तथा सरकार को लज्जा का सामना करना पड़ा। [†]

1833 की समाप्ति पर स्थिति यह थी कि अधिकरण ने यह इच्छा व्यक्त की कि चांदी के एकल मानक के साथ एकरूप मुद्रा रखी जाए जबकि भारत के अधिकारियों ने द्विधातु मानक के साथ आम मुद्रा की इच्छा व्यक्त की। चाहे ये अलग-अलग विचार कुछ भी क्यों न हों मुद्रा की वास्तविक स्थिति बराबर रहती।

ऽ ब्ांगाल के महालेखापाल ने 21 नवम्बर, 1823 के अपने पत्र में कलकत्ता टकसाल समिति को लिखाः

‘‘पैरा 32 शेष राशि मुद्रा की स्थिति पर आवश्यक रूप से निर्भर होनी चाहिए। यदि मद्रास, बंबई और

फर्रुखाबाद के रुपये भार और आंतरिक मूल्य में अंतर किए बिना ही एक मानक भार और मूल्य में ढाले

जाएं। उनकी अभिलेख भी एक ही हो किसी भी दशा में एक-दूसरे से अंतर न हों तो एक महाप्रान्त

की बचत को सर्वथा अन्य महाप्रान्त की मुद्रा के घाटे की पूर्ति में उपभोग किया जाएगा बिना एक साल

जाए और तीनों महाप्रान्तों के भुगतान के लिए उपलब्ध अधिक मुद्रा अनुपात में भारत की अवशेष मुद्रा

घट जाएगी बंबई फाइनेंशियल कन्सलटेशन्स, 25 फरवरी, 1824’’

† इस पद्धति के अवगुण को बंबई में पहले ही महसूस किया गया था जहां सरकार को 9 अप्रैल, 1924

के घोषणा पत्र में यह कहना पड़ा था कि 1819 के फर्रुखाबाद रुपये को आदर्श मानते हुए अपने राज्य

क्षेत्र में वैध मानक मुद्रा माना चाहिए ताकि बंगाल से पूति-क्रिया की सुविधा हो सके। देखिए बंबई

फाश्नेंशियल कन्सलटेशन्स, 14 अप्रैल, 18411