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दोहरे मानक से रजत मानक तक

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अधिकारियों ने किस प्रकार विद्रोह किया और वे कितनी सावधानी बरतते कि अधिक उग्रता से उल्लंघन उनके सिक्कों की सुधार की प्रक्रिया इसमें जहां तक संभव हो क्रान्तिकारी परिवर्तन न लाए, सोने के विमुद्रीकरण सम्बन्धी अधिनियम की धारा एक दुखद आश्चर्य थी फिर भी अकस्मात् पलटा खाने के लिए मुद्रा अधिनियम (1835) का 17 भारतीय इतिहास के आख्यान में स्मरण रहेगा इसने मुद्रा-सुधार के दीर्घकालीन और कठोर परिश्रम की प्रक्रिया के चरम बिंदु पर पहुंचा दिया तथा इसने भारत को चांदी के एक धातु वाले सिक्के का आधार बना दिया जिससे रुपये का भारत 180 ग्रेन ट्राय और 165 ग्रेन शुद्धता रही जो देश भर में आम मुद्रा और एकाकी विधिमान्य रूप में प्रचलित हुई।

ब्रिटिश भारत के किसी भी विधान ने आने वाले वर्षों में इतना असंतोष उत्पन्न नहीं किया जितना कि 1835 के संख्या 17 अधिनियम ने किया। जहां तक अधिनियम ने द्विधातु पद्धति को रद्द किया, और सभी ने एकमत से इसे आश्चर्य से देखा। फिर भी इसके सभी आलोचक इस बात से अवगत नहीं हैंऽ कि इस अधिनियम ने मुख्यतया जो निर्णय दिया उसका संबंध द्विधातु-मुद्रा के स्थान पर एकल धातु मुद्रा का प्रचलन करना था। इस अधिनियम के बारे में आम राय थी कि इसने सोने के मानक के स्थान पर चांदी का मानक ला दिया परंतु यदि इसकी सच्चाई के बारे में सामान्य रूप से अधिक ब्रोयोसे मानक भी हो तो भी इसके प्रति शत्रुता का व्यवहार किसी भी तरह न्यायसंगत नहीं होगा। 19वीं शताब्दी के मध्य में कैलीफोर्निया और आस्ट्रेलिया की स्वर्ण-खोजों का भारत के लिए क्या लाभ होता यदि उसने अपनी द्विधातु पद्धति को सुरक्षित रखना था? यह भली-भांति विदित है कि चांदी की तुलना में सोने के उत्पाद की वृद्धि से टकसाल में विविधता और वर्ष 1850 के बाद दोनों धातुओं के बाजार-अनुपातों में विविधता आई। चांदी की कमी का मूल्यांकन अधिक नहीं था फिर भी उस गंभीर स्थिति में द्विधातु अपनाने वाले देशों को गंभीर रूप से सामना करना था। इस स्थिति में जिसमें छोटे सिक्के समेत चांदी की मुद्रा तीव्र गति से परिचालन से बाहर हो रही थी। अमरीका [†] 1853 के कानून द्वारा इस बात के लिए बाध्य हो गया कि अपने छोटे चांदी के सिक्के के मानक को काफी कम कर दे ताकि डालर के बदले डालर का आकलन किया जाए जो उनके सोने के मूल्य से कम हो जिसके फलस्वरूप सिक्कों का परिचालन होता। फ्रांस, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड और इटली

ऽ देखिए एस. वी. डोरायस्वामी, इंडियन करेंसी, मद्रास, पेस्सिम

† लंघलिन, जे. एल. हिस्ट्री ऑफ वाइमैटलिज्म, न्यूयार्क, 1886, पृष्ठ 79-83

‡ फ्रांस के सांस्कृतिक प्रभाव ने लेटिन मूल देशों को फ्रांसिसी पद्धति की ओर अग्रसर किया। 1831 में

बेल्जियम ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद अपनी मुद्रा-पद्धति में परिवर्तन किया। 1832 के

कानून के अनुसार बेल्जियम आर्थिक दृष्टि से फ्रांस का पिछलग्गू हो गया। उस कानून के अनुसार