1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 51

36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में पारस्परिक वैध सिक्के [‡] के साथ फ्रांस के द्विधातु के मॉडल के आधार पर ऐसी एकरूप मुद्रा थी जिसे इसी प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कहीं ऐसा न हो कि प्रत्येक देशऽ यानी अपनी चांदी की मुद्रा और विशेषकर छोटे सिक्कों को बचाने की अलग-अलग नीति के कारण वहां प्रचलित मुद्रा की सामंजस्यता अस्त-व्यस्त हो जाए, और वे 20 नवम्बर 1865 को एक अधिवेशन में मिलने के लिए बाध्य हो गए ताकि पार्टियों को सामूहिक रूप से लेटिन यूनियन के नाते सिक्कों के परिचालन में 2 फ्रैंक के चांदी के सिक्के, एक फ्रैंक, 50 सेंटाइम और 900/1000 शुद्धता से 835/1000 शुद्धता के मानक से 20 सेंटाइम तक घटा लें और उन्हें सहायक सिक्के बना लें। [†] विधिमान्य चलार्थ की शक्ति को निरस्त कर दिया।

यह सत्य है कि सोने और चांदी के परस्पर मूल्यों में उथल-पुथल के फलस्वरूप भारत सरकार भी मुश्किल में पड़ गई परंतु यह कष्ट भारत सरकार को स्वयं की मूर्खता के कारण हुआ [‡] 1835 के मुद्रा कानून में सोने के मुक्त सिक्का-ढलाई

बेल्जियम ने पूर्णतया फ्रांस की मुद्रा-पद्धति को अपना लिया और बेल्जियम इतना उसने 20 और 40

फ्रैंक के सोने के फ्रांसिसी सिक्कों तथा चांदी के 5 फ्रैंक सिक्कों और इस प्रकार बेल्जियम में विधिमान्य

चलार्थ बना दिया। स्विट्जरलैंड के 1848 के संविधान के अनुच्छेद 36 ने संघीय सरकार को सिक्का

ढालने का प्राधिकार दे दिया। 7 मई, 1850 के कानून ने स्विट्जरजरलैंड के लिए फ्रांसिसी मुद्रा-पद्धति

स्वीकार कीः अनुच्छेद 8 में यह घोषणा की गईः ‘‘कि फ्रांसिसी पद्धति के काफी समीप ढाले गए चांदी

के सिक्के वैध होने चाहिए और वे सिक्के स्विट्जरलैंड में ऋणों के भुगतान के लिए नियमित माध्यम

बने।’’ एकीकरण के पूर्व इटली ने विभिन्न राज्यों में स्विस वैंटनों के समान अपनी ही मुद्रा-पद्धति परंतु

इटली में राज्यों के एकीकरण के बाद सिक्कों की एकरूपता की इच्छा के साथ पुरानी पद्धतियों में से

किसी पद्धति अथवा नयी पद्धति में से किसी के चयन की समस्या उठी ताकि वह पद्धति पूरे देश में

आम पद्धति बन सके। फ्रांस के प्रति आभार स्वरूप कुछ इटली निवासियों के मस्तिकों में यह बात

सर्वोपरि थी कि फ्रांस ने इटली को स्वतंत्रता दिलाने में सहायता की है। और फ्रांस की मुद्रा-पद्धति को

इटली के लिए स्वीकार करने से इस उद्धेश्य की पूर्ति हो जाएगी। सौभाग्यवश सार्डिनिया में पहले ही

फ्रेंच पद्धति का प्रचलन था और 24 अगस्त 1862 का कानून पूरे इटली देश में लागू कर दिया गया और

लायर को इकाई माना गया तथा फ्रांस, बेल्जियम और स्विट्जरलैंड के सिक्कों को विधिमान्य चलार्थ

मान लिया गया।

ऽ देखिए एच.पी.विल्स-हिस्ट्री ऑफ द लेटिन मोनेटरी यूनियन, शिकागो, 1910 पृष्ठ 15, 27, 36, 27

स्विट्जरलैंड ही पहला देश था जिसने चांदी को छोटे सिक्को में ढालने का काम किया ताकि उन

सिक्कों का परिचालन हो सके परंतु कम की गई शुद्धता के स्विट्रलैंड सिक्के देश की सीमाओं के

परे पहुंच गए और ये सिक्के लेटिन उद्भव के अन्य देशों के विधिमान्य पदार्थ थे। अतः इन सिक्कों

ने छोटे मूल्य वर्ग के अधिक महंगे सिक्कों को हटाना शुरू कर दिया। जिनमें अधिक चांदी थी परंतु

जो समान नाममात्र के मूल्य पर परिचालित रहे। इसमें फ्रांस (14 अप्रैल, 1864) में एक निर्णय हुआ

जिसने संबंधित सभी लेटिन देशों की ओर से समायोजित कार्रवाई के लिए विधिमान्य चलार्थ की शक्ति

को परास्त कर दिया।

† लेटिन यूनियन के अधिक विवरण के लिए देखिए-सामने का उद्धरण 146.9

‡ देखिए-सी, रिटर्न का एच., ईस्ट इंडियन (कानेज) 1860 का 254