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दोहरे मानक से रजत मानक तक

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के लिए टकसालों को बंद नहीं किया था जिसका कारण शायद यह था कि सोने के सिक्कों की ढलाई सामन्ती कर राजस्व-प्राप्ति का एक स्रोत था जिसे सरकार छोड़ना नहीं चाहती थी किन्तु सोने का वैध सिक्का विधिमान्य चलार्थ नहीं था अतः सोने के सिक्के ढालने के लिए टकसाल में नही लाया गया और साम्राज्यवादी देय राशि सिक्के की ढलाई से प्राप्त न होने से सरकारी राजस्व में गिरावट आ गयी। राजस्व की इस कमी को दूर करने के लिए सरकार ने सोने के सिक्कों की ढलाई को प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाए। सर्वप्रथमऽ 1837 में साम्राज्यवादी देय राशि दो प्रतिशत से कम करके एक प्रतिशत कर दी गई परंतु यह साधन इतना पर्याप्त नहीं था कि लोगों को टकसाल तक सोना लाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए जिसके फलस्वरूप साम्राज्यवादी देय राशि में वृद्धि नही हो सकी। इसकी दिशा में एक अन्य कदम उठाया गया, सरकार ने 13 जनवरी, 1841 को एक घोषणा जारी की जिसके अनुसार सार्वजनिक खजानों के प्रभारी अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया कि वे 15 चांदी के रुपये के बराबर एक सोने की मोहर की दर पर सोने के सिक्के प्राप्त करें। कुछ समय तक कोई सोना प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि घोषणा द्वारा निर्धारित दर पर सोने का मूल्यांकन कम किया गया था। [†] परंतु आस्ट्रेलिया और कैलीफोर्निया में सोने की खोजों ने इस स्थिति को बिल्कुल ही बदल दिया। सोने की मोहर का मूल्यांकन 15 रुपये की दर से करके उसका मूल्यांकन कम कर दिया गया था और अब सोने का अधिक मूल्यांकन किया गया तथा सरकार जो इस बात की उत्सुक थी कि सोना प्राप्त किया जाए। वही सरकार सोने के भारी मात्रा में आने से घबरा गई। सरकार ने एक ऐसे मार्ग का अनुसरण किया जिसके अनुसार एक ओर तो सोने के सिक्के को विधिमान्य चलार्थ मानने की घोषणा रद्द कर दी गई और दूसरी ओर सरकारी मांगों के परिसमापन के लिए सोना लेना प्रारंभ कर दिया गया। एक सिक्के ने सरकार को एक लज्जाजनक नुकसान की स्थिति में रख दिया, वह सिक्का जिसका कोई मूल्य नहीं था और जिसे अपने मूल्य से अधिक भुगतान सामान्यतया किया गया होगा। अपनी स्थिति का बोध होने पर सरकार ने सिक्कों की अधिक ढलाई द्वारा राजस्व की वृद्धि के सभी विचार त्याग दिए और 25 दिसम्बर, 1852 को शीघ्र ही एक अन्य घोषणा जारी की जिसके फलस्वरूप 1841 की घोषणा को वापस ले लिया गया। क्या यह अच्छा नहीं होता कि सोने के सिक्के को सामान्य विधिमान्य चलार्थ बनाकर इस अपमान से बच निकलने के बजाय उसकी आंशिक विधिमान्य चलार्थ शक्ति से उसे वंचित किया गया, परंतु जहां तक भारत का संबंध है, भारत उन परीक्षणों और विपत्तियों से बचा रहा जिन्हें द्विधातु पद्धति मानने वाले उन देशों ने उठाया था जो

46 देखिए-सी रिटर्न का एच, ईस्ट इंडियन (कानेज) 1860 का 254 पृष्ठ 8

† वही पृष्ठ 10