38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपनी मुद्रा के चांदी के सिक्कों को आरक्षित करना चाहते थे, ऐसी स्थिति में द्विधातु पद्धति का निरस्त करना कोई छोटा लाभ नहीं था। इस कदम में वे महान गुण थे जिसने देश को उन आने वाले परिवर्तनों से सचेत कर दिया जो भले ही उस समय दिखाई नहीं दिए किन्तु जल्दी ही सामने आ गए।
भारत में द्विधातुवाद को रद्द किए जाने का कार्य 1835 के अधिनियम द्वारा सम्पन्न हुआ। अतः इस कार्य को निंदा का आधार नहीं बनाया जा सकता। परंतु यह बात बहस का मुद्दा हो सकती है कि द्विधातुवाद की भर्त्सना चांदी के एकल धातुवाद के औचित्य का स्वतः प्रमाण नहीं है। यदि एकल धातुवाद को ही अपनाना था तो सोने के एकल धातुवाद को भी स्वीकार किया जा सकता था। वास्तव में चांदी के एकल धातुवाद को वरीयता देना कुछ विचित्र-सा नहीं लगता जब हम यह स्मरण करते हैं कि एकल धातुवाद के समर्थकऽ लार्ड लिवरपूल के सिद्धांत अधिकरण ने भारत में लागू करने चाहे थे। इंग्लैंड में तत्कालीन इसी प्रकार की मुद्रा के दोषों के खिलाफ उन्होंने सोने के एकल धातुवाद को निर्धारित किया था। अधिकरण इस मामले में अपने मार्गदर्शन से हटना स्वाभाविक रूप से इस गंभीर पथभ्रष्ट होने के औचित्य पर बहुत अधिक उत्तेजित कटु आलोचना हुई। [†] प्रारंभ में किसी की निष्ठा पर अंगुली उठाना बिल्कुल निराधार है। क्योंकि लार्ड लिवरपूल ‘‘स्वर्ण कीट’’ नहीं थे और ना ही अधिकरण के लोग ‘‘रजत मानव’’ थे। वास्तव में इनमें से किसी ने भी इस विचार से इस प्रश्न पर नहीं सोचा कि सोना अथवा चांदी में से किसका अधिक मान मूल्य है। वास्तव में जहां तक विचारणीय प्रश्न ध्यान देने योग्य था वह है अधिकरण की पसंद, जो तत्कालीन विचाराधारा के अनुसार निःसंदेह लार्ड लिवरपूल के विचारों से कहीं अधिक अच्छा विकल्प था। न केवल सभी सिद्धांतवादी जैसे कि लॉर्ड हैरिस ओ पेटरी चांदी के मानक मूल्य के पक्ष में थे। परन्तु समस्त विश्व में व्यावहारिक रूप से चांदी का ही समर्थन किया गया था। इसमें कोई संदेह नहीं कि इंगलैंड ने 1816 में स्वयं को सोने के आधार पर रख लिया था परन्तु चांदी के सिक्के मुक्त भाव से ढालने के लिए अंग्रेजी टकसाल बंद करने से कहीं दूर वह अधिनियम शाही घोषणा [‡] द्वारा कार्यान्वित किए जाने के हेतु बना रहा। यह सत्य है कि इस प्रकार की कोई घोषणा कभी जारी नहीं की गई परंतु इस बात का भी अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि तत्कालीन अंग्रेजों
ऽ बंगाल के गवर्नर सर जॉन शोर द्वारा प्रत्याशित ए ट्रीटाइज ऑन दि कॉइनेज ऑफ रियल्म अपने कार्यवृत्त
में संग्रहीत, सामने का उद्धरण, पैरा 55
† देखिए एच.एम.डानिंग-इंडियन करेंसी, 1898 देखिए एस.वी.डोरइस्वामी का उद्धरण यत्र-तत्र। ‡ देखिए डाना हार्टन-दि सिलवर पाउंड, 1887, पृष्ठ 161