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दोहरे मानक से रजत मानक तक

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तब सोना लोप हो जाता और चांदी मानक सिक्का बन जाती ख्1, और यह संभव है कि लोकप्रिय वरीयता ख्2, की नहीं वरन टकसाल के अनुपात के कारण भारत में चांदी के प्रावल्य प्रचलन का कारण रहा होगा। ख्3,

क्या लोकप्रियता के अलावा कोई अन्य कसौटी थी जो सोने के एकल धातुवाद के स्वीकार करने के लिए वरीयता बनी, यह विवादास्प्रद प्रश्न है। यह कहना पर्याप्त है कि चांदी के एकल धातुवाद का स्वीकार करना देश की आवश्यकताओं के लिए नितांत अपर्याप्त सिद्ध हुआ। यद्यपि जब वह अधिनियम बना उस समय इसका अच्छा समर्थन था। यह ध्यान देने योग्य बात है कि इसी समय भारत के लोगों की अर्थव्यवस्था में महान परिवर्तन आ रहे थे। इस प्रकार का परिवर्तन वस्तुओं के आदान-प्रदान की अर्थव्यवस्था के स्थान पर रुपये के लेन-देन की अर्थव्यवस्था स्थापित करने के लिए था।

इस कायापलट में सहायक मुख्य कारणों में से प्रथम स्थान राजस्व और वित्त की ब्रिटिश पद्धति को दिया जाना चाहिए। भारतीय समाज को रोकड़, अभिबंध में परिवर्तित करने के प्रभाव पर्याप्त रूप से अनुभव नहीं किए गए है ख्4, यद्यपि वे अत्यंत वास्तविक थे। देशी शासकों के अधीन अधिकांश भुगतान वस्तुओं में किए जाते थे। सरकार द्वारा स्थायी सैन्य शक्ति बनाए रखी गई और नियमित रूप से उसके लिए भुगतान किया गया परंतु यह सैन्य शक्ति अल्प मात्रा में थी। प्रादेशिक सेना के अधिकांश सिपाही जागीरदारों और अन्य जमीदारों द्वारा उपलब्ध कराए जाते थे तथा इन सामंतों के सैनिक अथवा परिचर अधिकांशतया अनाज, चारा और अन्य वस्तुओं पर रखे जाते थे जिन्हें उन जिलों द्वारा उपलब्ध कराया जाता था जहां वे रहते थे। वंशानुगत राजस्व और पुलिस अधिकारियों को सामान्यतया सेना की अवधि के अनुसार भूमि के अनुदान

  1. वर्क्स पृष्ठ 271

  2. श्री डॉडवेल ने अपने उत्कृष्ठ लेख-सामने के पृष्ठ पर उद्धरण में यह बताया है कि दक्षिण भारत में

सोने के स्थान पर चांदी का चयन किया गया और यह स्थिति चांदी के लिए लोगों की स्वाभाविक

वरीयता देने के कारण उत्पन्न हुई। वे श्री डोरैय स्वामी जैसे लेखकों के विचारों की पुष्टि करने के

इच्छुक रहे कि वे इस बात में असफल रहे हैं कि उनके प्रतिपादित तथ्य उनके अपने शोध प्रबंध के

प्रतिवादी है।

  1. श्री एफ.सी. हेरीसन के कलकत्ता रिव्यू जुलाई, 1892 में प्रकाशित तखमी ने के अनुसार 1800 से 1835

तक भारत में कुल सिक्के इस प्रकार थेः-

सोने........ ........ ......... .......... 3,845,000 औंस

चांदी...... ........ ......... ........... 3,781,250,000 औंस

टिप्पणी µचांदी के संबंध में रुपयों को औंस में बदल लिया जाता है ताकि तुलन की जा सके। 4. देखिए अप्रैल, 1857 में बम्बई क्वार्टरली रिव्यू में ‘‘दि सिल्वर क्वश्चन ऐज रिगार्डस इंडिया’’ नामक

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