42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
द्वारा भुगतान किया जाता था। खेतों में काम करने वाले नौकरों और मजदूरों की मजदूरी अनाज द्वारा चुकाई जाती थी। राज्य के अधिकांश अधिकारियों को माल में भुगतान किया जाता था और राज्य सरकार अपने करों को बहुत कम रोकड़ में वसूल कर पाती थी। अंग्रेजी शासन के इस अपरिष्कृत राजस्व और वित्तीय पद्धति में किए गए नव-प्रयोग अत्यंत व्यापक प्रकार के थे। जैसे ही अंग्रेजी शासन के अधीन एक राज्य क्षेत्र से लेकर दूसरा राज्य क्षेत्र आता गया, सबसे पहले कदम यह उठाया गया कि जमीदारों के ग्रामीण सैनिकों के स्थान पर नियमित रूप से गठित और अनुशासित स्थायी सेना बदल दी गई और इस सेना को अलग-अलग सैन्य शहरों पर तैनात कर दिया गया तथा उन्हें नकदी में भुगतान किया गया, सेना के समान असैनिक कर्मचारियों, पूर्व राजस्व तथा अनुचरों सहित पुलिस अधिकारियों को उपलब्धियों तथा माल में प्राप्त अन्य अप्रत्यक्ष लाभ द्वारा भुगतान किया जाता था। इन अधिकारियों के स्थान पर राजस्व अधिकारियों और दंडाधिकारियों को उनके अधिक से अधिक कर्मचारियों के साथ बदल दिया गया और उनको चालू सिक्के दिए गए। सेना, पुलिस और अन्य कर्मचारियों के ही भुगतान नहीं थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने सिक्कों के आधार पर रखा इन प्रभारों के अलावा अन्य प्रभार भी थे जो देशी सरकारों की जानकारी में नहीं थे यथा ‘‘गृह प्रभार’’ और ‘‘लोक ऋण पर ब्याज’’ और ये सभी रोकड़ के आधार पर थे। राज्य ने नकदी में भुगतान शुरू कर दिया। अतः राज्य सभी करों को नकदी में वसूल करने के लिए बाध्य हो गया और प्रत्येक नागरिक नकदी में अदा करने पर बाध्य हो गया। नागरिक ने भी बदले में नकदी मिलने का आग्रह किया अतः समाज की संपूर्ण संरचना की पूरी कायापलट हो गयी।
भारत के लोगों के अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ कि इस समय व्यापार में अत्यंत वृद्धि हुई। काफी समय तक अंग्रेजों की कर-नीति और नौचालन के कानून ने भारतीय व्यापार की वृद्धि पर भारी अंकुश लगा दिया। इंग्लैंड ने भारत को इस बात पर बाध्य किया कि भारत इंग्लैंड की कपास और अन्य निर्मित वस्तुओं को नाममात्र (2 ½ प्रतिशत) शुल्क पर ले परंतु इसके साथ ही इंग्लैंड ने भारत की उन वस्तुओं के प्रवेश पर निषेधाज्ञा लगा दी जो भारत के राज्य क्षेत्र में तैयार की जाती थी और उन पर 50 से 500 प्रतिशत का निषेधात्मक शुल्क लगाया जाता था। इंग्लैंड ने भारत के साथ कोई भी आदान-प्रदान नहीं किया परंतु इंग्लैंड ने अपने अन्य उपनिवेशों के साथ उन वस्तुओं के लिए भेद-भाव रखा जो उन उपनिवेशों में तैयार की जाती थी। इंग्लैंड के अनुचित व्यवहार के विरुद्ध भारी आंदोलन ख्1, शुरू किया
- देखिए-भारतीय वाणिज्य को प्रभावित करने वाले शुल्क के संबंध में ईस्ट इंडिया हाउस की बहस
-एशियाटिक जर्नल एंड मंथली रजिस्टर फॉर ब्रिटिश एंड फॉरेन इंडिया, चाइना, आस्ट्रेलिया, लंदन, नई
शृंखला, खंड XXXVII जनवरी और खंड XXXVIII मई, 1842