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दोहरे मानक से रजत मानक तक

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था। वस्तुतः यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार वास्तव में स्वर्ण मुद्रा के विरोध में गंभीर थी। अपनी स्थिति को शक्तिशाली बनाने के लिए सरकार ने सोने के विरुद्ध अपने तर्कों के ठोस होने पर विश्वास नहीं किया अपितु उसकी इस खोज पर विश्वास किया गया कि मौजूदा स्वर्ण मुद्रा के स्थान पर उसके हाथ में दूसरा विकल्प मौजूद है। यदि केवल वर्तमान मुद्रा में पूरक की आवश्यकता थी तो सरकार द्वारा प्रस्तावित उपचार अपराजेय था। सोना खर्चीला और असुविधाजनक था। कागजी मुद्रा के साथ चांदी की मुद्रा मितव्ययतापूर्ण, सुविधाजनक तथा विस्तारपूर्ण थी। वास्तव में सरकारी विकल्प के पक्ष में इतने अधिक लाभ थे कि चांदी के मानक के लिए प्रथम प्रयास से सोने के मानक की स्थापना ही नहीं हुई अपितु उपलब्ध चांदी के मानक के पूरक के रूप में सरकारी कागजी मुद्रा को प्रारंभ किया गया ।

चाहे कुछ भी क्यों न हो, लोगों की इच्छा सोने के मानक के लिए इतनी प्रबल थी कि उसकी पूर्ण रूप से अनदेखी नहीं की जा सकती थी। यद्यपि इसकी मांग वैकल्पिक साधनों द्वारा पूरी मानी गई थी। कागजी मुद्रा जैसा कि प्रारंभ में श्री विलसन द्वारा विचार किया गया था, स्वर्ण विरोध पूर्णतया घोर निंदक था परंतु उनके उत्तराधिकारी श्री लैंग उनसे असहमत थे और उन्होंने भारतीय मुद्रा के सोने के बहिष्कार बर्बरतापूर्ण कहा। इसलिए उन्होंने मूल विधेयक में दो महत्वपूर्ण उपबंध प्रस्तुत किए, जब इसके कार्यान्वयन का भार उन पर पड़ा क्योंकि श्री विलसन का आकस्मिक निधन हो गया था। एक कार्य यह था कि 5 रुपये की सबसे कम मूल्य की कागजी मुद्रा को 20 रुपये की कागजी मुद्रा में बढ़ाना था। दूसरा कार्य थाµ

‘‘गवर्नर -इन काउंसिल को इस बात का अधिकार देना कि वे लिखित आदेश

समय-समय पर कलकत्ता, मद्रास और बम्बई के गजट में प्रकाशित करेंगे कि

कागजी मुद्रा जो सिक्के और सर्राफे द्वारा प्रतिनिधित्व करने वाले प्रचलन की कुल

राशि के चौथाई भाग से अधिक मूल्य के न हों उन्हें ......... सोने के सिक्के के

लिए विनिमय में जारी किया जाए.............अथवा ऐसे आदेश द्वारा निर्धारित की

जाने वाली दरों पर संगठित सर्राफा.......’’

अधिनियम जिसमें बाद में विधेयक भी समा गया दूसरा उपबंध पूर्णतया स्वीकार कर लिया और प्रथम उपबंध को इस संशोधन के साथ स्वीकार किया कि जारी की जाने वाली कागजी मुद्रा में सबसे कम मूल्य वर्ग की कागजी मुद्रा 10 रुपए की होनी चाहिए। यद्यपि इसका सामान्य प्रयोजन स्पष्ट है दूसरे उपबंध का सामान्य उपबंध सरकारी कागजातों के देखने से बिलकुल स्पष्ट नहीं हो पाता। कागजी मुद्रा विधेयक पर चयन समिति ने ऐसा कहा प्रतीत होता है कि उपबंध अहानिकारक था यदि वह अच्छा न था। इसने सोचाµ