दोहरे मानक से रजत मानक तक
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और नवंबर 1864 में सरकारी अधिसूचना जारी की जिसमें यह घोषणा ख्1, की कि ‘‘इंग्लैंड अथवा आस्ट्रेलिया की अभिकृत शाही टकसाल में ढाले गए वर्तमान भार के सोव और आधे सोवरन को जब तक कि अन्य सूचना न हो माना जायेगा सभी भारत स्थित अंग्रेजी खजाने तथा इसके अधानस्थ खजानों में सरकार को देय राशि के भुगतान में 10 व 5 के क्रमशः बराबरी पर दिया जाएगा। और यह कि सोवरन और आधा सोवरन जब कभी सरकारी खजाने में उपलब्ध होंगे तो सरकार के दावों के भुगतान के लिए समान दरों पर उन्हें किसी भी इच्छुक व्यक्ति को दिया जाएगा।’’ सोवरन की वास्तविक समानता 10 रुपये से कुछ अधिक मूल्य की थी। इसलिए अधिसूचना पर कोई कार्यवाही न हो सकी। दूसरी ओर मुद्रा की स्थिति पूर्ववत अधिक विकट रही और भारत सरकार ने 1866 में बंगाल चैम्बर ऑफ कामर्स के कहने पर सोने के परिचालन को प्रभावकारी बनाने के लिए कदम उठाए। इस बार चैम्बर ने जांच आयोग के गठन पर जोर दिया जिसका विषय था ‘‘भारत की मुद्रा पद्धति में सोने के सिक्के जारी करने की उपयुक्तता’’ परंतु भारत सरकार ने यह कहा ख्2, कि सोने की अपेक्षा कागजी मुद्रा जारी की गई है जिससे यह आशा है कि बहुमूल्य धातुओं में से किसी भी धातु की अपेक्षा यह अधिक सुविधाजनक और मान्य परिचालित माध्यम सिद्ध होगी।’’ और इसके फलस्वरूप ‘‘यह देखा जाना चाहिए कि कागजी-मुद्रा देश के लोगों की आदतों के अनुसार मांग और उपयुक्तता की दृष्टि से परिचालित माध्यम सिद्ध नहीं हुई है और सिद्ध नहीं होने की संभावना भी है जब तक कि कागजी मुद्रा के निरस्त करने अथवा इसके अलावा स्वर्ण मुद्रा के चलन का प्रयास किया जाए।’’ अतः एक आयोग का गठन किया गया ताकि 1861 के एक्ट 19 के अंतर्गत स्थापित ‘‘वर्तमान मुद्रा प्रबंधों के कार्य-व्यापार’’ की जांच की जा सके और यह रिपोर्ट दी जाए कि ‘‘उपयुक्ता पर आधारित भारत में सोने की विधिमान चलार्थ के जारी किए जाने के क्या लाभ हैं। और इसके साथ ही साथ चांदी की मुद्रा का भी आकलन किया जाए।’’ आयोग ने विस्तृत जांच करने के बाद यह निष्कर्ष ख्3, निकाला कि कई कारणों के फलस्वरूप कागजी मुद्रा देश में परिचालित माध्यम के रूप में स्थापित होने से असफल हो गई परंतु लोगों के लेन-देन के लिए सोने की मुद्रा का अधिक अच्छा स्थान बन गया। अंत में आयोग ने सरकार से अनुरोध किया कि भारत में मुद्रा संबंधी प्रबंधों के लिए सोने
- देखिए भारत में स्वर्ण-मुद्रा के संबंध में सर मैन्स फील्ड द्वारा कार्यवृत के साथ अनुलग्नक ‘क’, सी.
रिटर्न 79 का एच, 1865
- 3 फरवरी, 1866 के वित्तीय विभाग का प्रस्ताव जिसे उसी तारीख को विज्ञप्ति संख्या 592 के अंतर्गत
फोर्ट विलियम गजट में प्रकाशित कराया गया।
- कमीशन की रिपोर्ट के लिए देखिए सी. रिटर्न 148, 1868 का एच