1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 73

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को विधिमान्य चलार्थ माना जाए।’’ अब सरकार की बारी थी कि वह इस सिफारिश को कार्यान्वित करे। परंतु यह अजीब सी बात है कि सरकार आयोग की सिफारिशों को अपनाने की ओर नहीं बढ़ी जबकि यह आयोग स्वयं सरकार द्वारा गठित किया गया था। सोने को विधिमान्य चलार्थ बनाने की बजाए जैसा कि आयोग ने सलाह दी थी, सरकार ने केवल एक ही कार्य किया वह यह कि 28 अक्तूबर, 1868 को एक अन्य अधिसूचना जारी की जिसमें केवल सोवरन की दर को 10-8 रुपए में परिवर्तित कर दिया गया और इस एक तरफा कानून के दुष्परिणाम को बचाने के लिए अन्य कुछ भी नहीं किया गया। सौभाग्यवश सरकार के लिए सौभाग्यशाली रहा इस दर को ठीक करने पर भी यह देश में सोने का परिचालन बढ़ाने में असमर्थ रहा। उस समय तक मुद्रा संबंधी कठिनाइयां कम हो गई थीं और चूंकि सरकार पर कोई नया दबाव नहीं डाला गया अतः इससे अंत में यह भारत में स्वर्ण मुद्रा जारी करने के लिए सरकार के दो असफल प्रयास सिद्ध हुए। ख्1,

कुछ समय के लिए इस समस्या का निराकरण घटनाओं के स्वाभाविक क्रम से हुआ परंतु बाद की घटनाओं जैसा दिखाया कि स्वर्ण मानक में परिवर्तन भारत के लिए अधिक श्रेयस्कर होता है ख्1, और यूरोप के हितों के लिए इसका स्वागत किया जाता ख्2, जो उस समय सोने की अधिकता के कारण ऊंचे मूल्यों से संकटग्रस्त था। उस खास मौके पर भारत सरकार सचमुच में एक चौराहे पर खड़ी थी और उस विपत्ति को दूर कर सकती थी जो भारत और उसके लोगों पर आई यदि सरकार ने परिवर्तन की हवा का साथ दिया होता और चांदी के मानक बदले में स्वर्ण मानक कर दिया होता जैसा कि वह आसानी से कर सकती थी यह कुछ वे जो कि भारतीय मामलों में अधिकार समर्थ और उन्होंने अपना पूरा अधिकार परिवर्तन के विरुद्ध लगाया यह कोई बेईमानी की बात नहीं थी जिसके लिए उनकी भर्त्सना की जाय। ख्3, परन्तु इससे मनुष्य के अनर्थकारी कारनामों का एक और उदाहरण मिलता है जिसमें अक्सर आदमी सोचने लगता है कि उसकी स्थिति बहुत अधिक

  1. यह कहना सही है कि प्रोफेसर जे. ई. केयरनीज भारत में स्वर्ण मानक के जारी करने के विरुद्ध थे

परन्तु बाद में उन्होंने अपनी आपत्तियों को हटा लिया। देखिए पॉलीटिकल इकोनामी (लंदन 1873 पृ.

88-90) में उनके निबंध।

  1. देखिए जे. आर. मैक गुलॉक µडिकशनरी ऑफ कॉमर्स, संस्करण 1869, पृ. 1131
  2. श्री एच. बी. रसल का कहना है कि उन्होंने चांदी के मानक को इसलिए रखा कि वे अपने भेजी गई

रकम पर इसके द्वारा लाभ उठाते रहे। देखिए उनके इंटरनेशलन मॉनेटरी कांफ्रेंसिस 1898, पृ.32