2. रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन - Page 80

रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन

65

‘‘धारा 21ः टकसाल में लाई सभी चांदी सर्राफा अथवा सिक्का ऊपर बताए गए टकसाल नियमों के अनुसार सिक्का बनाने के लिए मालिक को किए गए वापसी से ऐसे उत्पाद पर 2 प्रतिशत की दर से शुल्क लिया जाएगा।’’

‘‘धारा 22ः सोने के सर्राफा और सिक्के पर ¼ प्रति हजार और चांदी के सर्राफा तथा सिक्के पर 1 प्रति हजार का प्रभार सर्राफा या सिक्के की ढलाई अथवा कटाई पर लगाया जाएगा ताकि वे टकसाल में उपयुक्त रूप से लिए जा सके।’’

‘‘धारा 23ः टकसाल में सिक्का ढालने के लिए लाया गया सभी सोना और चांदी सर्राफा तथा सिक्का और जो इस अधिनियम द्वारा निर्धारित मानक-शुद्धता की दृष्टि से कम हो अथवा जो भुरभुरेपन या अन्य किसी कारणवश सिक्का बनाने के लिए अनुपयुक्त हो और यदि इसे शुद्ध कर लिया जाता है तो इसे ऐसी दशा में इस पर ऊपर बताए गए शुल्क और प्रभार के अतिरिक्त, गवर्नर जनरल इन कांसिल द्वारा शुद्ध करने के लिए हानि और व्यय की निर्धारित राशि भी देनी होगी।’’

‘‘धारा 24ः टकसाल का मास्टर सिक्के ढालने हेतु सोना या चांदी का बुलियन या सिक्के टकसाल में प्राप्त करने पर उसके स्वामी को एक रसीद देगा जिसके अनुसार सिक्के का निबल वह कसौटी मास्टर से इस आशय का प्रमाणपत्र पाने का अधिकारी होगा जिससे वह सामान्य खजाने में देय निवल उत्पादन कर सकेगा।’’

‘‘धारा 25ः सभी सोना बुलियन और सिक्के के जिसके संबंध में कसौटी मास्टर ने प्रमाण पत्र दे दिया हो उसका भुगतान यथासंभव सोने के सिक्कों में किया जाएगा जिन्हें इस अधिनियम अथवा 1835 के अधिनियम संख्या XVII के अधीन ढाला गया हो और स्वामी को देय कोई भी शेष (यदि कोई हो) चांदी या चांदी और तांबे के सिक्कों में ब्रिटिश भारत में किया जाएगा।’’

यह ध्यान देने योग्य बात है कि कागजी मुद्रा के प्रचलन के मामले में सरकार स्वतंत्रता के सिद्धांत पर आगे नहीं बढ़ी जो उस समय में देश प्रचलित थी। लोगों में आमतौर पर इस बात की गलतफहमी है कि सरकारी कागजी मुद्रा के प्रचलन के पूर्व नोटों को निकालने का अधिकार तीनों महाप्रान्तों के बैंकों तक ही सीमित था। सच बात तो यह है कि उस समय भारत में एक प्रथा मौजूद थी जिसे मुक्त बैंकिंग पद्धति कहा जाता है जिसके अनुसार प्रत्येक बैंक को यह स्वतंत्रता थी कि वह अपने नोट जारी करे। यह सत्य है कि महाप्रान्तों के बैंकों के नोटों को अन्य बैंकों के नोटों की तुलना मेंं थोड़ी अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी जैसे वे सरकार द्वारा राजस्व के भुगतान में भी कुछ सीमा तक स्वीकार किया जा सकता था। ख्1, इस विशेष सुविधा के महाप्रान्तों

  1. देखिए एफ. सी. हेरीसन, इकनामिक जर्नल, 1891, खंड ए. पृष्ठ 726