2. रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन - Page 81

66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के बैंकों को अपने वाणिज्य संबंधी कारोबार में विधायकी नियंत्रण की सख्त देख-रेख के आगे झुकना पड़ता था ख्1, इससे उन बैंकों को छूट दे दी गयी थी जिनके मामलों को यह विशेष सुविधा प्राप्त नहीं थी परंतु यह सुविधा इतनी पर्याप्त नहीं थी कि अन्य बैंक नोट निकालने के मामले में जिसके लिए कानून ने उन्हें छूट दी थी। फिर भी इस मामले की स्वतंत्रता किसी बैंक ने बहुत बड़े पैमाने पर उपयोग नहीं की। यहां तक कि महाप्रांतों के बैंकों ने भी ऐसा नहीं किया ख्2, और 1861 में ख्3, सभी से यह अधिकार

  1. इस प्रकार के नियंत्रण का कारण था तत्कालीन सरकार व महाप्रांतों के बैंकों के बीच विचित्र संबंधों

का लगातार बना रहना थे। 1862 से पूर्व इनके दिवालियापन की सुरक्षा के लिए ‘‘महाप्रांतों के बैंक

शासन पत्र में ऐसे व्यापार को सीमित रखने के लिए कहा जिनमें वे अभी तक लगे हुए थे। संक्षेप में

मुख्य अवरोध द्वारा बैंकों को इस बात के लिए मना कर दिया गया कि वे विदेशी विनिमय व्यापार के

लिए बैंकों का संचालन करें और इसमें उन्हें उधार लेने अथवा भारत से बाहर देय जमा राशियों को

प्राप्त करें तथा छह महीने से अधिक अवधि के लिए उधार दे देने अथवा गिरवी रखें अथवा अचल

सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए अथवा दो स्वतंत्र नामों से कम नाम के वचन पत्र हों अथवा भाव हों जब

तक कि माल अथवा उस माल पर अधिकार पत्र बैंक में जमानत के तौर पर जमा न हों। सरकार के

बैंकों में शेयर रखें और सरकार के निदेशालय का कुछ हिस्सा भी बनाया 1862 में जब नोट जारी करने

का अधिकार वापस ले लिया गया तो बैंकों के व्यवसाय पर कानूनी अवरोधों में अधिक शिथिलता लाई

गई यद्यपि नियंत्रण का सरकारी अधिकार अपरिवर्तित बना रहा। परंतु कुछ मामलों में बैंकों में अपनी

स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया अतः 1876 में प्रैसीडैंसी बैंक अधिनियम द्वारा प्रारंभिक अवधि के पुराने

अवरोधों को फिर से लागू कर दिया गया। फिर भी सरकार ने प्रबंध में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करना छोड़

दिया, सरकारी निदेशकों की नियुक्ति बंद कर दी गई और बैंकों में अपने शेयर निपटा दिए। इन प्रतिबंधों

में से कुछ प्रतिबंध 1920 के एक्ट XLVII में सम्मिलित किए गए जिसके फलस्वरूप महाप्रान्तों के 3

बैंकों को समेकित करके इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया बना दिया गया। महाप्रान्तों के बैंकों के अलावा

अन्य बैंक विधायी नियंत्रण से नितांत मुक्त किए गए। स्थिति चाहे कुछ भी क्यों न हो प्रतिबंध यह रहा

कि इंडियन कंपनी एक्ट के उपबंधों के अनुगामी बनाए गए। देखिए इस संबंध में सर हैनरी मेन द्वारा

कार्यवृत्त संख्या 47 और उसके साथ संलग्न डब्ल्यू स्टोक द्वारा दी गई टिप्पणी। इन बैंकों का नियंत्रण

भारत में बैंक संबंधी विधायकी की महत्वपूर्ण समस्याओं में से एक समस्या है। 2. फिर भी इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि 1860 में तीन महाप्रान्तों बैंकों के नोटों का परिचालन उनके

चालू लेखों की तुलना में अधिक था जैसा कि आगे दिया हैः

बैंक का नाम ­ चालू लेखे­ परिचालन में नोट ­

बैंक ऑफ बंगाल ­ पौंड 1,2,54,875­ पौंड 1,2,83,946­

बैंक ऑफ बाम्बे­ 4,38,459­ 7,65,234­

बैंक ऑफ मद्रास­ 1,61,959­ 1,92,791­

(बैंकर्स, मेगजीन, अप्रैल, 1893 पृष्ठ 547)

  1. बैंक इशू बनाम सरकारी इशू के संबंध में विवाद का सारांश देखिए 1859-60 के लिए रिपोर्ट ऑफ द

बाम्बे चैम्बर ऑफ कॉमर्स की रिपोर्ट अनुलग्नक L, पृष्ठ 284-318