रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन
67
ले लिया गया। जब समस्त भारत के लिए राष्ट्रीय प्रचलन स्थापित किया गया और जिसका प्रबंध कागजी मुद्रा विभाग नामक सरकारी विभाग को दिया गया। परंतु यदि निजी हित में कागजी मुद्रा के निर्धारण में वही भूमिका अदा करने के लिए अनुमति नहीं दी गई थी जैसी कि धातु मुद्रा के संबंध में अनुमति दी गई थी और कागजी मुद्रा के नियमन के संबंध में सरकारी विभाग के लिए कोई भी विवेकाधिकार नहीं छोड़ा गया कागजी मुद्रा विभाग को कागजी मुद्रा के संबंध में कोई विवेकाधिकार नहीं था जैसा कि टकसाल मास्टर को धातु मुद्रा के मामले में अधिकार था।
विभाग का कर्तव्य कानून ख्1, द्वारा नोटों की राशि के लिए विनिमय तक ही सीमित थाः (1) भारत सरकार का चालू चांदी-सिक्का, (2) सिक्का ढालने के लिए उपयुक्त मानक चांदी के प्रति एक हजार तोले से 979 की दर पर मानक के अनुसार संगठित विदेशी चांदी-सिक्का अथवा मानक चांदी-बुलियन में, (3) भारत सरकार के अन्य नोटों में जो उसी सर्किल में जारी की गई अन्य राशियों की मांग पर धारक को देय है, और (4) भारत सरकार का सोने का सिक्का अथवा विदेशी सोना सिक्का अथवा बुलियन के लिए ऐसे ही अनुपात पर संगठित और गवर्नर जनरल द्वारा निर्धारित नियमों और प्रतिबंधों के अनुसार देय होगा किंतु शर्त यह है कि सोने के नाम पर जारी किए गए नोट सिक्का और सर्राफा द्वारा प्रतिनिधित्व करने वाले इशू की कुल राशि के ¼ भाग से अधिक न होगा। इस समस्त राशि की आवश्यकता कानून द्वारा निर्धारित राशि के सिवाए जारी किए गए नोटों के भुगतान के लिए रिजर्व रखी जानी थी। यह राशि सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश की जानी थी और इस पर अर्जित ब्याज की राशि ही सरकार के लिए लाभ थी। इस प्रकार निवेश की गई राशि की सीमा का प्रबंध ‘‘उस सबसे कम राशि से किया जाना था जिसका अनुमान सभी संगत अनुभव के अनुसार किया गया था जिसके फलस्वरूप कागजी मुद्रा के गिर जाने की आशा थी। ख्2, इस आधार पर अनुमान लगाते हुए निवेश के भाग की सीमा 1861 ख्3, में 4 करोड़ ! और 1871 ख्4, में 6 करोड़ ख्5, तथा 1890 में
सेक्शन- IV एक्ट XIX, 1861
देखिए कागजी मुद्रा विधेयक (पेपर करेंसी बिल) 25 मार्च 1970 के संबंध में सर रिचार्ड टैम्पल का
प्रारंभिक भाषण, सुप्रीम लैजिस्लेटिव कांऊसिल प्रोसिडिंग्स, खंड IX पृ. 151-52 3. एक्ट XIX सेक्शन X
एक्ट III, सेक्शन 16
एक्ट XV, सेक्शन 1