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रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन

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बनाया गया था परंतु उन्हें केवल निर्गम कार्यालय में ही नकदी में बदला जा सकता था। भारत में कागजी मुद्रा के इस प्रकार के विचित्र संगठन के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी बात यह थी कि देश में आंतरिक विनिमय ख्1, का परिचालन था। इसने एक गंभीर समस्या उत्पन्न की जिसका सरकार को समाधान करना था। यदि नोटों को इस प्रकार बनाया जाता कि व्यापक रूप से भुनाया जा सके तो यह आशंका थी कि सौदागार नोटों को मुद्रा के रूप में प्रयोग न करके विभिन्न केन्द्रों में प्रेषण के रूप में उनका उपयोग करेंगे ताकि आंतरिक विनिमय को बचाया जा सके और सरकार इस बात के लिए बाध्य होती कि निधियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजे चाहे नकदी भुगतान को रोकना पड़ जाए। इतने सुदूर केन्द्रों के बीच में ऐसे बड़े पैमाने पर संसाधन क्रियाओं को हाथ में लेने के लिए अधिक तीव्र परिवहन की सुविधाएं नहीं थी और स्पष्टतया यह कार्य संभव ख्2, नहीं था और इसलिए सरकार ने यह निर्णय लिया कि जिन नोटों को जारी किया है उनके भुनाने की सुविधाएं कम कर दी जाएं। कागजी मुद्रा के प्रयोजनों के लिए सरकार ने देश को निर्गम के लिए कई वृत्तों में विभाजित कर दिया और प्रत्येक मुद्रा वृत्त को आगे उप वृत्त में विभाजित किया गया ख्3, और जारी किए गए नोटों पर उस सर्किल अथवा उपसर्किल का नाम अंकित किया गया जहां से वे नोट जारी किए गए थे।

  1. यह बताया जा सकता है कि यद्यपि महाप्रांतों के बैंकों ने नोटों के जारी करने का काम बंद कर दिया

था फिर भी 1861 के एक्ट XXIV के अंतर्गत सरकार के साथ किए गए समझौते के अधीन सरकार

द्वारा बैंक नियुक्त किए गए थे’’ ताकि वे भारत सरकार के प्रौमीसरी नोटों के भुगतान और विनिमय,

प्रचालन के एजेंटों के बनाने, उनका परिवेक्षण और प्रबंध तथा प्रचालन की एजेंसी के व्यापार को चलाने

के लिए बैंक की एजेंसी के द्वारा बकाया और परिचालन के सरकारी मुद्रा के नोटों के दैनिक औसत

धन पर 3/4 प्रतिशत प्रतिवर्ष की पारिश्रमिक दिया जाए।’’ यह सघर्ष जो भारत सरकार और सेक्रेटरी

ऑफ स्टेट के बीच उठा क्योंकि यह विश्वास किया गया था कि बैंकों के इस प्रकार के काम में लाने

के औचित्य के संबंध में नोटों के प्रसार और इसे लोकप्रिय बनाने में सहायता मिलेगी। इस कार्य के

लिए भारत सरकार समर्थक रही जबकि सैक्रेट्री ऑफ स्टेट ने इस समझौते को पसंद नहीं किया क्योंकि

उन्हें ऐसा लगा कि प्रचालन व्यापार और बैंकिंग के व्यापार के बीच पूर्ण अलगाव के सिद्धांत के साथ

समझौता किया गया है फिर भी इन दोनों में से किसी ने भी इस तथ्य को आत्मसात् नहीं किया कि

आंतरिक विनिमय के परिचालन के कारण अलग-अलग केंद्रों में प्रेषण पर लाभ इतना अधिक था

कि बैंकों को स्वीकृत कमीशन उनके स्वतंत्र रूप से भुनाने के लिए अपर्याप्त प्रोत्साहन था। आंतरिक

विनिमय इतना अधिक था और बैंक नोटों को लोकप्रिय बनाने के लिए अनिच्छुक थे कि अन्ततोगत्वा

सरकार ने उन्हें 2 जनरवरी, 1866 से कागजी मुद्रा के लिए अपना एजेंट रखने से उन्हें भार मुक्त कर

दिया। देखिए-हाउस ऑफ कामन्स रिटर्न 1862 की ईस्ट इंडियन (पेपर मनी) 215 2. देखिएµ पेपर करेंसी बिल तारीख 16 फरवरी, 1861 के बारे में माननीय श्री लैंग का भाषण, एस.एल.

सी.पी. खंड VII पृष्ठ 73-74

  1. प्रत्येक सब सर्किल में इशू की अनेक एजेन्सियां थी परंतु ये एजेन्सियां नकदी में बदलने वाले केन्द्र नहीं

थे परंतु जारी करने वाले केन्द्र ही थे।