2. रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन - Page 85

70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

निर्गम के वृत्त के भीतर समाविष्ट राज्य क्षेत्र में स्थित निर्गम की एजेंसी से जारी किए गए नोट किसी अन्य मुद्रा वृत्त के राज्य क्षेत्र में विधिमान्य चलार्थ नहीं थे और उन्हें अपने वृत्त से बाहर भुनाया नहीं जा सकता था। इतना ही नहीं मुख्य वृत्त के अधीन उपवृत्तों से जारी किए गए नोट किसी अन्य राज्य क्षेत्र मे विधिमान्य चलार्थ नहीं थे। परंतु वे अपने निर्गम कार्यालय में ही भुनाने योग्य थे अथवा अपने मुख्य वृत्त के निर्गम कार्यालय मेंं भुनाने योग्य थे। इस प्रकार के उपवृत्त के नोट दो स्थानों पर ही भुनाये जा सकते थे ख्1, परंतु मुख्य सर्किल के निर्गम कार्यालय के नोट उसके अधीन समग्र राज्य क्षेत्र में विधिमान्य चलार्थ माने गए थे, वे किसी अन्य स्थान के अलावा अपने ही काउन्टर पर भुनाये जा सकते थे और अपने वृत्तों में से किसी पर भी नहीं भुनाए जा सकते थे। इस प्रकार व्यापक रूप से भुनाने के अभाव ने लज्जाजनक संभावना से तो सरकार को बचाया परंतु यह उन नोटों की लोकप्रियता में इतने भारी अवरोध सिद्ध हुए कि इसके बारे में संदेह किया जा सकता है कि क्या कागजी मुद्रा ने जितनी प्रगति की है उससे भी अधिक प्रगति की जा सकती थी चाहे नोटों के सबसे कम मूल्य वर्ग उसके वास्तविक मूल्य से अपेक्षाकृत कम मूल्य का होता।

फिर भी इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारतीय विधानमंडल का ऐसा कोई इरादा नहीं था कि भारतीय मुद्रा को इतना मितव्ययी ख्2, बनाया जाए जैसी कि कार्यकारी सरकार ने इच्छा व्यक्त की थी। कागजी मुद्रा के मूल रचयिता द्वारा विधानमंडल से निःसंदेह यह अनुरोध किया गया था कि भारत को नवीन पीरू देश जैसा बना दिया जाए जहां बहुत कम लागत में अधिक से अधिक मुद्रा तैयार की जाती थी ख्3, परंतु विधानमंडल में ऐसी नीति के अपनाने में सहायता करने के मामले पर बुद्धिमत्तापूर्व चुप्पी साधी चूंकि नोट भुनाने के केन्द्र बहुत कम थे और प्रत्येक केन्द्र में इतना विशाल क्षेत्र सम्मिलित किया गया था जो उस वृत्त में भुनाने के एक केन्द्र से दूसरा केन्द्र लगभग 700 मील दूर था इसलिए उसने इस प्रकार यह छोटे मूल्यों के

  1. वृत्त पद्धति की असुविधाओं और नोटों के भुनाने की सुविधा के लिए सरकार द्वारा सुविचारित अलग-अलग

कानूनों के लिए देखिये 1868-69 के लिए बम्बई चैम्बर ऑफ कॉमर्स की रिपोर्ट, अनुलग्नक पृ.

309-16

  1. देखिए 22 सितम्बर, 1860 को माननीय श्री इरकानसे का पूरा भाषण, एस.एल.सी.पी. खंड पृष्ठ 1143 A

नीचे दिया हुआ

  1. देखिए भारत में कागजी मुद्रा (पेपर करेंसी) के जन्मदाता श्री विल्सन का भाषण, दिनांक 3 मार्च, 1860

जिसमें उन्होंने कहा है ‘‘सारांश में परिचालन के प्रयोजन हेतु नितांत यांत्रिक ढंग से इतना सिक्का तैयार

किया जाए कि उसके स्थान पर परिवर्तनीय कागजी मुद्रा की आपूर्ति की जा सके और यह वास्तव में

समान ही होगी मानों एकाएक मैडन के केंद्र में एक समृद्ध चांदी की खान की खोज की गई हो जिससे

बहुत कम या बिना लागत के चांदी निकाली जाए। सुप्रीम लैजिसलेटिव कौंसिल प्रोसीडिंग्स खंड VI,

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